सुनसान बस स्टॉप

 सुनसान बस स्टॉप

रात के 11:55 बजे थे।

आदित्य अपनी ऑफिस की नाइट शिफ्ट खत्म करके घर लौट रहा था।

बारिश अभी-अभी रुकी थी। सड़कें पूरी तरह खाली थीं।

उसकी आखिरी बस छूट चुकी थी।

अब उसे अगले एक घंटे तक बस स्टॉप पर इंतज़ार करना था।

वह पुराने बस स्टॉप की टूटी बेंच पर बैठ गया। ऊपर लगी ट्यूबलाइट बार-बार झिलमिला रही थी।

फ्लिक… फ्लिक…

आसपास अजीब सन्नाटा था।

तभी उसकी नज़र बस स्टॉप के कोने में बैठी एक लड़की पर पड़ी।

सफेद सलवार… भीगे बाल… और हाथ में लाल छाता।

वह चुपचाप नीचे देख रही थी।

आदित्य ने सोचा शायद कोई और यात्री होगी।

उसने मोबाइल निकाला, लेकिन नेटवर्क नहीं था।

तभी लड़की धीरे से बोली—

“यहाँ रात में अकेले नहीं रुकना चाहिए…”

आदित्य ने उसकी तरफ देखा।

उसकी आवाज़ बहुत ठंडी थी।

“क्यों?” आदित्य हँसते हुए बोला।

लड़की ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

उसकी आँखों के नीचे गहरे काले निशान थे।

“क्योंकि… यहाँ हर रात कोई ना कोई गायब हो जाता है।”

आदित्य हल्का सा असहज हो गया।

“तुम मज़ाक अच्छा कर लेती हो।”

लड़की कुछ नहीं बोली।

बस सामने अंधेरी सड़क को देखती रही।

कुछ मिनट बाद दूर से बस की हेडलाइट दिखाई दी।

आदित्य खुश हो गया।

“चलो, बस आ गई।”

लेकिन जैसे-जैसे बस पास आई…

उसकी खुशी डर में बदलने लगी।

बस बहुत पुरानी थी।

उस पर मिट्टी जमी हुई थी।

और सबसे अजीब बात—

बस पर कोई नंबर नहीं लिखा था।

बस धीरे-धीरे उनके सामने आकर रुकी।

दरवाज़ा अपने आप खुला।

चीईईईं…

अंदर पूरा अंधेरा था।

ड्राइवर का चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

आदित्य पीछे हट गया।

“ये कौन सी बस है?”

तभी लड़की अचानक खड़ी हो गई।

उसकी आवाज़ काँप रही थी—

“मत चढ़ना…”

“क्या?”

“जो इस बस में चढ़ता है… वो कभी वापस नहीं आता।”

आदित्य का दिल तेज़ी से धड़कने लगा।

उसी समय बस के अंदर से धीमी आवाज़ आई—

“आदित्य…”

वह जम गया।

उसने ध्यान से सुना।

फिर वही आवाज़—

“आदित्य… अंदर आओ…”

वह आवाज़ उसकी माँ की थी।

लेकिन उसकी माँ की मौत दो साल पहले हो चुकी थी।

आदित्य की साँसें तेज़ हो गईं।

“ये… ये कैसे हो सकता है?”

बस के अंदर अचानक हल्की रोशनी जली।

और आदित्य का खून जम गया।

अंदर सीटों पर कई लोग बैठे थे।

सभी के चेहरे पीले थे… आँखें खाली…

और उनमें उसकी माँ भी बैठी थी।

वही साड़ी… वही चेहरा…

माँ धीरे-धीरे मुस्कुराई।

“बेटा… घर चलो…”

आदित्य की आँखों में आँसू आ गए।

वह बस की तरफ बढ़ने लगा।

तभी लड़की ने उसका हाथ पकड़ लिया।

उसका हाथ बर्फ जैसा ठंडा था।

“ये तुम्हारी माँ नहीं है।”

“लेकिन मैंने उन्हें देखा!”

लड़की चीखी—

“ये बस लोगों की यादों का इस्तेमाल करती है!”

अचानक बस के अंदर बैठे सारे लोग एक साथ आदित्य को देखने लगे।

धीरे-धीरे उनके चेहरे बदलने लगे।

आँखें पूरी काली हो गईं।

होंठ फटने लगे।

और फिर सब एक साथ मुस्कुराए।

आदित्य डरकर पीछे हट गया।

तभी ड्राइवर धीरे-धीरे सीट से उठा।

उसका चेहरा पूरी तरह जला हुआ था।

वह भारी आवाज़ में बोला—

“एक सीट अभी खाली है…”

बस के अंदर से अजीब फुसफुसाहट गूँजने लगी—

“आ जाओ…”

“आ जाओ…”

“आ जाओ…”

आदित्य के कानों में तेज़ दर्द होने लगा।

वह भागने के लिए मुड़ा।

लेकिन अचानक उसे एहसास हुआ—

पूरा बस स्टॉप गायब हो चुका था।

अब वहाँ सिर्फ घना अंधेरा था।

सिर्फ वही बस खड़ी थी।

और उसके पीछे… अंतहीन काली सड़क।

“ये क्या हो रहा है?” वह चिल्लाया।

लड़की रोने लगी।

“मैं भी इसी बस में मरी थी…”

आदित्य सन्न रह गया।

“क्या?”

“तीन साल पहले।

मैंने भी अपनी माँ की आवाज़ सुनी थी… और बस में चढ़ गई।”

उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

“तब से मैं यहाँ फँसी हूँ… लोगों को बचाने के लिए।”

अचानक बस का इंजन अपने आप चालू हो गया।

घर्रररर…

बस धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ने लगी।

आदित्य पीछे हटने लगा।

लेकिन उसके पैर जमीन से चिपक गए।

बस के अंदर बैठे लोग जोर-जोर से हँसने लगे।

ड्राइवर चीखा—

“अब तुम्हारी बारी है!”

बस का दरवाज़ा पूरी तरह खुल गया।

अंदर से काले हाथ बाहर निकलने लगे।

आदित्य चीख पड़ा।

तभी लड़की ने उसका हाथ पकड़ा।

“भागो!”

दोनों अंधेरे में दौड़ने लगे।

उनके पीछे बस तेज़ हॉर्न बजाते हुए आ रही थी।

पााआआं!

आदित्य बार-बार पीछे देख रहा था।

बस अब बहुत करीब थी।

तभी लड़की अचानक रुक गई।

“आदित्य…”

“क्या हुआ?”

उसने हल्की मुस्कान दी।

“अगर मैं इसे रोकूँ… तो तुम बच सकते हो।”

“नहीं!”

लेकिन लड़की उसकी बात सुने बिना बस के सामने चली गई।

अचानक तेज़ सफेद रोशनी फैली।

बस जोर से चीखी।

अंदर बैठे सारे लोग दर्द से चिल्लाने लगे।

ड्राइवर गुस्से से दहाड़ा—

“नहींईई!”

और अगले ही पल…

पूरी बस आग में घिर गई।

धड़ाम!

आदित्य दूर जाकर गिर पड़ा।

कुछ सेकंड बाद…

सब शांत हो गया।

न बस थी।

न अंधेरा।

न वह लड़की।

सिर्फ खाली सड़क और पुराना बस स्टॉप।

सुबह जब आदित्य ने पुलिस को सब बताया, तो वे उसे पास के थाने ले गए।

एक बूढ़े पुलिसवाले ने उसकी बात सुनकर गहरी साँस ली।

फिर उसने पुरानी फाइल निकाली।

फाइल में एक लड़की की फोटो थी।

आदित्य के हाथ काँप गए।

वह वही लड़की थी।

पुलिसवाले ने धीरे से कहा—

“तीन साल पहले इस बस स्टॉप पर एक बस में आग लगी थी।

सभी यात्री जलकर मर गए थे।”

आदित्य की आँखें फैल गईं।

“और ये लड़की?”

पुलिसवाले की आवाज़ धीमी हो गई।

“उसने मरने से पहले तीन लोगों की जान बचाई थी…”

आदित्य चुप हो गया।

उस रात के बाद उसने कभी देर रात बस का इंतज़ार नहीं किया।

लेकिन आज भी…

जब भी बारिश वाली रात में कोई उस बस स्टॉप से गुजरता है…

उसे सफेद कपड़ों में एक लड़की दिखाई देती है…

जो धीरे से सिर्फ एक बात कहती है—

“अगर बिना नंबर की बस आए… तो उसमें कभी मत चढ़ना…”

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