दिल्ली से रात 11 बजे निकलने वाली “कालिंदी एक्सप्रेस” हमेशा की तरह भीड़ से भरी हुई थी। लोग अपनी सीटें ढूँढ रहे थे, कोई फोन पर बात कर रहा था, तो कोई खाना खा रहा था।
लेकिन प्लेटफॉर्म नंबर 7 पर खड़ा एक आदमी बार-बार पीछे मुड़कर देख रहा था।
उसका नाम था “विवान”।
25 साल का विवान पेशे से वीडियो एडिटर था। उसे रात में सफर करना बिल्कुल पसंद नहीं था, लेकिन एक जरूरी काम के कारण उसे उसी रात भोपाल जाना पड़ रहा था।
जैसे ही ट्रेन चलने लगी, एक बूढ़ा कुली उसके पास आया।
उसकी आँखें अजीब थीं… बिल्कुल डरी हुई।
“बाबू… आख़िरी डिब्बे में मत जाना।”
विवान चौंका। “क्यों?”
कुली ने धीमी आवाज़ में कहा, “जो लोग वहाँ जाते हैं… वो वापस नहीं आते।”
इतना कहकर वह भीड़ में गायब हो गया।
विवान हल्का हँसा। उसे लगा कोई मज़ाक होगा।
उसकी सीट S-9 कोच में थी।
ट्रेन धीरे-धीरे शहर से बाहर निकलने लगी। खिड़की के बाहर अंधेरा बढ़ता जा रहा था।
करीब एक घंटे बाद विवान को याद आया कि उसका कैमरा बैग शायद प्लेटफॉर्म पर छूट गया है।
घबराकर उसने फोन निकाला, लेकिन नेटवर्क गायब था।
उसी समय उसके पास बैठे एक आदमी ने कहा, “अगर बैग चाहिए… तो आख़िरी डिब्बे में देख लो।”
“आख़िरी डिब्बा?” विवान ने पूछा।
आदमी ने सिर हिलाया। “हाँ… कई बार सामान वहाँ पहुँच जाता है।”
विवान उठकर चल पड़ा।
एक-एक करके वह कोच पार करने लगा।
S-9… S-10… S-11…
जैसे-जैसे वह आगे बढ़ रहा था, ट्रेन अजीब शांत होती जा रही थी।
अब ना लोगों की आवाज़ थी, ना बच्चों का शोर।
बस ट्रेन की पटरी पर दौड़ने की आवाज़।
“ठक… ठक… ठक…”
आख़िरकार वह ट्रेन के आख़िरी डिब्बे तक पहुँच गया।
लेकिन उसे देखकर उसका दिल बैठ गया।
उस डिब्बे पर कोई नंबर नहीं था।
पूरा डिब्बा पुराना और जंग लगा हुआ था। जबकि बाकी ट्रेन बिल्कुल नई थी।
दरवाजा आधा खुला था।
अंदर हल्की पीली रोशनी जल रही थी।
विवान ने हिम्मत करके दरवाजा खोला।
“कर्ऽऽऽ…”
अंदर कदम रखते ही उसे तेज ठंड महसूस हुई।
पूरा डिब्बा खाली था।
सीटों पर धूल जमी हुई थी।
जैसे सालों से वहाँ कोई आया ही ना हो।
लेकिन तभी…
उसे एक सीट पर अपना कैमरा बैग दिखाई दिया।
“ये यहाँ कैसे आया?” वह बुदबुदाया।
वह बैग उठाने ही वाला था कि अचानक पीछे से आवाज़ आई—
“तुम देर से आए…”
विवान ने घबराकर पीछे देखा।
एक बूढ़ा टीटी उसके पीछे खड़ा था।
काला कोट। सफेद चेहरा। और आँखों के नीचे गहरे काले निशान।
“म… मेरा बैग…” विवान हकलाया।
टीटी मुस्कुराया। “बैग मिल गया। अब टिकट दिखाओ।”
विवान ने जल्दी से टिकट निकाला।
टीटी ने टिकट देखा… फिर धीरे-धीरे हँसने लगा।
“ये टिकट… इस ट्रेन का नहीं है।”
विवान चौंक गया। “क्या मतलब? मैं इसी ट्रेन में बैठा हूँ!”
टीटी की मुस्कान और चौड़ी हो गई। “ये ट्रेन अब इस दुनिया में नहीं चलती।”
अचानक डिब्बे की सारी लाइटें झपकने लगीं।
“टिक… टिक… टिक…”
विवान पीछे हट गया।
तभी उसने खिड़की से बाहर देखा…
और उसकी साँस रुक गई।
बाहर कोई स्टेशन नहीं था। कोई पेड़ नहीं। कोई शहर नहीं।
सिर्फ घना अंधेरा।
जैसे ट्रेन हवा में दौड़ रही हो।
विवान का गला सूख गया। “ये… क्या है?”
टीटी धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ा। “25 साल पहले यही ट्रेन दुर्घटना का शिकार हुई थी। आख़िरी डिब्बे में बैठे सभी लोग मर गए थे।”
विवान की आँखें फैल गईं।
“न… नहीं… ये झूठ है!”
टीटी की आवाज़ अचानक भारी हो गई। “हम आज भी सफर कर रहे हैं… नए यात्रियों की तलाश में।”
तभी अचानक डिब्बे की खाली सीटों पर लोग दिखाई देने लगे।
जले हुए चेहरे। खून से सने कपड़े। और खाली आँखें।
पूरा डिब्बा मृत यात्रियों से भर गया।
सबकी निगाहें विवान पर टिक गईं।
एक छोटी बच्ची धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ी।
उसके हाथ में टूटी हुई गुड़िया थी।
“अंकल… हमारे साथ खेलोगे?”
विवान डर के मारे पीछे हट गया।
तभी ट्रेन अचानक जोर से हिलने लगी।
“घड़ड़ड़ड़ड़…”
लाइटें बंद हो गईं।
पूरा डिब्बा अंधेरे में डूब गया।
अंधेरे में सिर्फ लोगों की फुसफुसाहट सुनाई दे रही थी।
“यहीं रह जाओ…” “हमारे साथ रहो…” “अब तुम वापस नहीं जा सकते…”
विवान पागलों की तरह दरवाजे की तरफ भागा।
लेकिन दरवाजा गायब था।
अब वहाँ सिर्फ लोहे की दीवार थी।
उसकी साँसें तेज हो गईं।
तभी किसी ने उसका कंधा पकड़ लिया।
वह चीख पड़ा।
लेकिन सामने एक जवान लड़का खड़ा था।
उसके चेहरे पर खून था।
“अगर बचना चाहते हो… तो अगला स्टेशन आने से पहले कूद जाओ।”
“क… कौन हो तुम?”
“मैं भी कभी तुम्हारी तरह यहाँ फँसा था।”
ट्रेन की रफ्तार बढ़ती जा रही थी।
अचानक दूर से एक स्टेशन दिखाई दिया।
लेकिन वो स्टेशन सामान्य नहीं था।
पूरा स्टेशन धुएँ में डूबा था।
प्लेटफॉर्म पर खड़े लोग बिना चेहरे के थे।
और स्टेशन के बोर्ड पर लिखा था—
“मृत्यु नगर”
विवान का शरीर काँप उठा।
टीटी जोर से चिल्लाया— “कोई यात्री उतर नहीं सकता!”
तभी सारे मृत यात्री विवान की तरफ बढ़ने लगे।
उनकी आँखें अब पूरी काली हो चुकी थीं।
विवान ने पूरी ताकत से दौड़ लगाई।
जैसे ही ट्रेन स्टेशन के पास पहुँची…
उसने चलती ट्रेन से छलांग लगा दी।
“धड़ाम!”
वह प्लेटफॉर्म पर गिर पड़ा।
उसके सिर से खून बहने लगा।
लेकिन जब उसने ऊपर देखा…
तो उसकी रूह काँप गई।
ट्रेन गायब थी।
पटरी पर कुछ भी नहीं था।
पूरा स्टेशन वीरान था।
सिर्फ एक पुराना बोर्ड पड़ा था—
“यह स्टेशन 25 साल पहले बंद हो चुका है।”
विवान की साँसें अटक गईं।
उसी समय पीछे से पुलिस की आवाज़ आई।
“अरे! ये यहाँ कैसे आया?”
पुलिस वालों ने उसे संभाला।
उन्होंने बताया कि इस लाइन पर 25 साल पहले एक भयानक ट्रेन हादसा हुआ था।
उस हादसे के बाद यह स्टेशन हमेशा के लिए बंद कर दिया गया।
विवान काँप उठा।
“लेकिन… मैं अभी उसी ट्रेन से आया हूँ…”
पुलिस वाले एक-दूसरे को देखने लगे।
एक बूढ़ा कांस्टेबल धीरे से बोला, “फिर तुम बहुत किस्मत वाले हो… क्योंकि उस ट्रेन से आज तक कोई ज़िंदा वापस नहीं आया।”
कुछ दिनों बाद विवान अपने घर लौट आया।
उसने उस घटना के बारे में किसी को कुछ नहीं बताया।
धीरे-धीरे वह सामान्य होने लगा।
एक रात वह अपने कैमरे की रिकॉर्डिंग देख रहा था।
वीडियो में शुरुआत में सब सामान्य था।
फिर अचानक स्क्रीन पर आख़िरी डिब्बा दिखाई दिया।
कैमरा अपने-आप हिल रहा था।
और फिर…
वीडियो में विवान खुद दिखाई दिया।
लेकिन एक चीज़ गलत थी।
वीडियो वाला विवान कैमरे की तरफ देखकर मुस्कुरा रहा था…
जबकि असली विवान उस समय कैमरा पकड़े हुए था।
अचानक वीडियो में पीछे वही टीटी दिखाई दिया।
उसने धीरे से कहा—
“अगली यात्रा जल्द शुरू होगी…”
और तभी विवान के कमरे के बाहर ट्रेन की सीटी गूँज उठी।
“फूँऽऽऽऽ…”
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