बंद लिफ्ट का रहस्य

 बंद लिफ्ट का रहस्य

सूर्या टॉवर शहर की सबसे पुरानी इमारतों में से एक थी। 18 मंज़िला यह बिल्डिंग दिन में लोगों से भरी रहती, लेकिन रात होते ही इसका माहौल बदल जाता।

खासतौर पर उसकी पुरानी सर्विस लिफ्ट।

बिल्डिंग के सिक्योरिटी गार्ड्स कहते थे—

“रात 2:17 के बाद उस लिफ्ट का इस्तेमाल मत करना।”

क्यों?

इस सवाल का जवाब कोई नहीं देता था।

कुछ लोग कहते थे कि सालों पहले वहां एक हादसा हुआ था। कुछ कहते थे कि लिफ्ट में कोई मर गया था। और कुछ लोग सिर्फ इतना कहते—

“अगर लिफ्ट खुद-ब-खुद 13वीं मंज़िल पर रुक जाए… तो बाहर मत निकलना।”

22 साल का अर्णव एक वीडियो एडिटर था। वह हाल ही में सूर्या टॉवर की 15वीं मंज़िल पर बने ऑफिस में काम करने लगा था। उसे रात तक काम करना पड़ता था, इसलिए अक्सर वह पूरी बिल्डिंग खाली होने के बाद ही घर जाता।

एक रात भारी बारिश हो रही थी। ऑफिस में सिर्फ अर्णव बचा था।

उसने घड़ी देखी।

2:05 AM.

“बस ये प्रोजेक्ट खत्म करके निकलता हूं…” उसने खुद से कहा।

करीब 10 मिनट बाद उसने लैपटॉप बंद किया और ऑफिस से बाहर निकल आया। पूरा फ्लोर सुनसान था। ट्यूबलाइट्स बार-बार झपक रही थीं।

वह लिफ्ट के पास पहुंचा और बटन दबाया।

टिंग…

कुछ सेकंड बाद पुरानी सर्विस लिफ्ट उसके सामने आकर रुकी।

दरवाजा धीरे-धीरे खुला।

अंदर हल्की पीली रोशनी जल रही थी।

अर्णव अंदर चला गया।

उसने Ground Floor का बटन दबाया।

दरवाजा बंद हुआ।

लिफ्ट नीचे जाने लगी।

15…

14…

13…

अचानक लिफ्ट जोर से झटकी।

और रुक गई।

लाइट्स एक पल के लिए बंद हुईं।

फिर वापस जल उठीं।

अर्णव ने ऊपर देखा।

डिस्प्ले पर लिखा था—

13

लेकिन उसे याद आया—

इस बिल्डिंग में तो 13वीं मंज़िल थी ही नहीं।

12वीं मंज़िल के बाद सीधे 14वीं मंज़िल थी।

उसका गला सूख गया।

तभी लिफ्ट का दरवाजा खुद-ब-खुद खुलने लगा।

बाहर पूरा अंधेरा था।

जैसे वहां कोई मंज़िल ही न हो।

सिर्फ लंबा काला गलियारा।

अर्णव ने डरते हुए बाहर झांका।

गलियारे में दूर कहीं हल्की लाल रोशनी जल रही थी।

और उसी रोशनी के नीचे…

कोई खड़ा था।

एक लड़की।

सफेद कपड़े… लंबे बाल… और झुका हुआ सिर।

अर्णव का दिल तेजी से धड़कने लगा।

उसने तुरंत Close Door बटन दबाया।

लेकिन बटन काम नहीं कर रहा था।

तभी लिफ्ट के स्पीकर से खरखराती आवाज आई—

“दरवाजा बंद नहीं होगा…”

अर्णव पीछे हट गया।

उसने मोबाइल निकाला।

नो नेटवर्क।

तभी गलियारे में खड़ी लड़की धीरे-धीरे उसकी तरफ चलने लगी।

टक…

टक…

टक…

उसके कदमों की आवाज पूरे अंधेरे में गूंज रही थी।

जैसे-जैसे वह पास आ रही थी, लिफ्ट की लाइट्स तेजी से झपकने लगीं।

अर्णव ने घबराकर Emergency Alarm दबाया।

लेकिन अलार्म की जगह स्पीकर से किसी लड़की के रोने की आवाज आने लगी।

अब वह लड़की बिल्कुल लिफ्ट के सामने खड़ी थी।

उसका चेहरा बालों से ढका हुआ था।

और उसके पैरों के नीचे खून फैला हुआ था।

अर्णव सांस तक नहीं ले पा रहा था।

तभी लड़की ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया।

उसकी आंखें पूरी काली थीं।

और चेहरा बुरी तरह जला हुआ था।

“तुम… देर से आए…” उसने फुसफुसाते हुए कहा।

अचानक लिफ्ट का दरवाजा जोर से बंद हो गया।

धड़ाम!

लिफ्ट तेजी से नीचे गिरने लगी।

अर्णव चीख पड़ा।

डिस्प्ले की संख्याएं तेजी से बदलने लगीं—

10…

7…

3…

-1…

-3…

-5…

“ये क्या हो रहा है?!” अर्णव कांप उठा।

बिल्डिंग में बेसमेंट सिर्फ दो थे।

फिर लिफ्ट नीचे कैसे जा रही थी?

अचानक लिफ्ट रुक गई।

दरवाजा धीरे-धीरे खुला।

इस बार सामने पुराना, जला हुआ फ्लोर था।

दीवारें काली थीं।

चारों तरफ धुआं और जलने की बदबू फैली हुई थी।

अर्णव डरते हुए बाहर निकला।

दीवार पर टूटा हुआ बोर्ड लटका था—

“13th Floor”

उसकी आंखें फैल गईं।

मतलब… इस बिल्डिंग में सचमुच 13वीं मंज़िल थी।

लेकिन उसे छिपाया क्यों गया?

तभी पीछे से किसी के दौड़ने की आवाज आई।

अर्णव पलटा।

गलियारे में कई परछाइयां तेजी से भाग रही थीं।

और दूर से लोगों की चीखें सुनाई दे रही थीं।

“आग लग गई!!”

“बचाओ!!”

पूरा फ्लोर अचानक जलती आग से भर गया।

अर्णव समझ गया—

वह किसी पुराने हादसे को देख रहा था।

तभी उसे एक कमरे के अंदर वही लड़की दिखाई दी।

वह दरवाजे के पीछे फंसी हुई थी।

आग तेजी से फैल रही थी।

लड़की मदद के लिए चीख रही थी—

“कोई दरवाजा खोलो!”

लेकिन बाहर खड़े लोग भाग रहे थे।

कोई उसकी मदद नहीं कर रहा था।

तभी अचानक एक आदमी आया।

उसने दरवाजे को बाहर से लॉक कर दिया।

अर्णव की आंखें फटी रह गईं।

मतलब…

ये हादसा नहीं था।

किसी ने जानबूझकर उसे अंदर बंद किया था।

अगले ही पल आग भड़क उठी।

लड़की की चीख पूरे फ्लोर में गूंज गई।

और सब कुछ अंधेरे में डूब गया।

अर्णव हांफते हुए पीछे हट गया।

तभी उसके कान के पास आवाज आई—

“उसने मुझे मारा था…”

अर्णव पलटा।

वही जली हुई लड़की उसके बिल्कुल पीछे खड़ी थी।

उसका चेहरा अब और भी डरावना था।

जलती हुई त्वचा… काली आंखें… और होंठों पर अजीब मुस्कान।

“सबने इसे हादसा कहा…” वह बोली।

“लेकिन उसने मुझे जिंदा जलाया…”

अचानक पूरी मंज़िल कांपने लगी।

दीवारों पर हाथों के निशान उभरने लगे।

चारों तरफ से लोगों की चीखें सुनाई देने लगीं।

अर्णव भागकर वापस लिफ्ट की तरफ दौड़ा।

लेकिन लिफ्ट गायब थी।

उसकी जगह सिर्फ काली दीवार थी।

तभी गलियारे के आखिर में एक दरवाजा अपने आप खुला।

अंदर हल्की रोशनी थी।

अर्णव धीरे-धीरे वहां पहुंचा।

कमरे के अंदर पुराने अखबार और फाइलें बिखरी थीं।

एक अखबार पर हेडलाइन लिखी थी—

“सूर्या टॉवर में भीषण आग — 27 लोगों की मौत”

तारीख 1998 की थी।

अर्णव तेजी से पन्ने पलटने लगा।

एक फोटो देखकर उसका दिल रुक गया।

फोटो में वही लड़की थी।

नाम— रिया मेहरा।

वह बिल्डिंग की कर्मचारी थी।

और रिपोर्ट में लिखा था—

“आग इलेक्ट्रिकल शॉर्ट सर्किट से लगी।”

लेकिन नीचे लाल स्याही से किसी ने लिखा था—

“झूठ।”

तभी कमरे का दरवाजा बंद हो गया।

धड़ाम!

अर्णव घबरा गया।

और उसी समय कमरे के कोने में रखा पुराना टीवी खुद-ब-खुद चालू हो गया।

स्क्रीन पर धुंधली फुटेज चल रही थी।

रिया किसी आदमी से बहस कर रही थी।

वह आदमी बिल्डिंग का मालिक था।

रिया चिल्ला रही थी—

“मैं सबको सच बता दूंगी!”

मालिक गुस्से में बोला—

“तुम ये गलती नहीं करोगी।”

वीडियो अचानक बंद हो गया।

फिर टीवी स्क्रीन पर सिर्फ एक लाइन दिखाई दी—

“उसने मुझे रोका… हमेशा के लिए…”

अचानक कमरे की सारी लाइट बंद हो गईं।

अब सिर्फ टीवी की सफेद रोशनी जल रही थी।

और उस रोशनी में अर्णव ने देखा—

रिया धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ रही थी।

उसके जले हुए पैरों से राख गिर रही थी।

“सच बाहर लाओ…” उसने कहा।

अगले ही पल अर्णव बेहोश हो गया।

सुबह जब उसकी आंख खुली, वह बिल्डिंग के ग्राउंड फ्लोर पर पड़ा था।

सिक्योरिटी गार्ड उसे घबराकर देख रहे थे।

“तुम रातभर कहां थे?” गार्ड बोला।

अर्णव कांपते हुए उठा।

उसने ऊपर देखा।

डिस्प्ले बोर्ड पर सिर्फ 18 मंज़िलें थीं।

13वीं मंज़िल कहीं नहीं थी।

लेकिन उसकी जेब में कुछ था।

एक पुरानी जली हुई फोटो।

रिया की फोटो।

पीछे लिखा था—

“अब सच सबको पता चलेगा।”

कुछ दिनों बाद अर्णव ने इंटरनेट पर पुराने रिकॉर्ड ढूंढे। उसे पता चला कि 1998 की आग के बाद बिल्डिंग के मालिक ने पैसे देकर मामला दबा दिया था।

रिया उस आग की अकेली गवाह थी।

और उसे जिंदा जला दिया गया।

अर्णव ने सारी जानकारी पुलिस और मीडिया को दे दी।

मामला फिर खुला।

लोगों को सच पता चल गया।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

एक महीने बाद अर्णव देर रात दूसरी बिल्डिंग की लिफ्ट में था।

लिफ्ट अचानक रुक गई।

डिस्प्ले पर एक नंबर चमका—

13

फिर स्पीकर से वही आवाज आई—

“धन्यवाद…”

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