आधी रात का स्कूल

 आधी रात का स्कूल

राजस्थान के एक छोटे गाँव के बाहर एक पुराना सरकारी स्कूल था।

दिन में वहाँ बच्चे पढ़ते थे, लेकिन शाम होते ही पूरा स्कूल खाली हो जाता था।

गाँव वालों का कहना था कि रात 12 बजे के बाद उस स्कूल में किसी बच्चे के पढ़ने की आवाज़ आती है।

कभी ब्लैकबोर्ड पर अपने आप लिखावट दिखाई देती…

कभी खाली क्लासरूम में घंटी बजने लगती…

और कभी-कभी…

स्कूल की दूसरी मंज़िल की खिड़की में एक बच्चा दिखाई देता था।

लेकिन सबसे अजीब बात—

उस स्कूल की दूसरी मंज़िल पिछले 20 साल से बंद थी।

आदित्य, वरुण और नेहा तीनों शहर से आए थे। वे पैरानॉर्मल वीडियो बनाते थे और इस स्कूल की कहानी सुनकर यहाँ शूट करने पहुँचे।

रात के 11:30 बज रहे थे।

स्कूल बाहर से बिल्कुल शांत दिख रहा था।

टूटा हुआ गेट हवा में धीरे-धीरे हिल रहा था।

चीईईं…

चीईईं…

नेहा ने डरते हुए पूछा—

“क्या सच में अंदर जाना जरूरी है?”

आदित्य मुस्कुराया—

“अगर भूत मिल गया तो वीडियो करोड़ों में जाएगा।”

तीनों टॉर्च लेकर अंदर गए।

स्कूल के कॉरिडोर में धूल जमी थी। दीवारों पर पुराने पोस्टर लगे थे।

लेकिन एक चीज़ अजीब थी।

एक क्लासरूम से हल्की रोशनी आ रही थी।

वरुण धीरे-धीरे दरवाज़े के पास पहुँचा।

अंदर कोई नहीं था।

लेकिन ब्लैकबोर्ड पर चॉक अपने आप चल रही थी।

चररर…

चररर…

तीनों के सामने बोर्ड पर शब्द उभरे—

“क्लास शुरू हो चुकी है।”

नेहा डरकर पीछे हट गई।

अचानक स्कूल की घंटी बज उठी।

टन्न्न्न्न!

पूरा स्कूल उस आवाज़ से गूँज उठा।

और फिर…

ऊपर दूसरी मंज़िल से बच्चों के दौड़ने की आवाज़ आने लगी।

धप… धप… धप…

आदित्य ने टॉर्च ऊपर घुमाई।

दूसरी मंज़िल के कॉरिडोर में कई छोटे-छोटे साये भागते दिखाई दिए।

लेकिन अगले ही पल सब गायब हो गया।

वरुण फुसफुसाया—

“ऊपर तो बंद है ना?”

तभी पीछे से एक बच्चे की आवाज़ आई—

“सर आ गए…”

तीनों तुरंत पलटे।

क्लास के आखिरी बेंच पर एक छोटा लड़का बैठा था।

सफेद स्कूल यूनिफॉर्म…

झुका हुआ सिर…

और हाथ में पुरानी कॉपी।

आदित्य ने हिम्मत करके पूछा—

“तुम यहाँ क्या कर रहे हो?”

लड़के ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

उसकी आँखें पूरी काली थीं।

और होंठों पर अजीब मुस्कान।

“आप लेट हो गए…”

अचानक सारी लाइट बंद हो गई।

पूरा स्कूल अंधेरे में डूब गया।

नेहा चीख पड़ी।

फिर कॉरिडोर में एक साथ बच्चों की फुसफुसाहट गूँजने लगी—

“नई टीचर आ गई…”

“नई टीचर आ गई…”

आदित्य ने मोबाइल की फ्लैशलाइट ऑन की।

लेकिन रोशनी में जो दिखाई दिया, उससे उसके हाथ काँपने लगे।

पूरा कॉरिडोर बच्चों से भरा था।

दर्जनों बच्चे…

सभी पुराने स्कूल यूनिफॉर्म में…

और सबकी आँखें पूरी काली।

वे चुपचाप खड़े होकर उन्हें देख रहे थे।

अचानक एक बच्चा आगे बढ़ा।

उसके सिर पर गहरी चोट का निशान था।

उसने धीमी आवाज़ में कहा—

“मैडम ने हमें बाहर नहीं जाने दिया था…”

नेहा काँप गई।

“कौन मैडम?”

तभी ऊपर से भारी कदमों की आवाज़ आई।

ठक…

ठक…

ठक…

जैसे कोई धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतर रहा हो।

सभी बच्चे अचानक चुप हो गए।

फिर एक साथ फुसफुसाए—

“मैडम आ रही हैं…”

सीढ़ियों के ऊपर एक औरत खड़ी थी।

पुरानी साड़ी…

हाथ में लकड़ी का स्केल…

और चेहरा अंधेरे में छुपा हुआ।

वह धीरे-धीरे नीचे उतरने लगी।

ठक…

ठक…

ठक…

जैसे-जैसे वह नीचे आ रही थी, बच्चों के चेहरे डर से बदलने लगे।

आदित्य ने हिम्मत करके पूछा—

“तुम कौन हो?”

औरत रुक गई।

फिर धीरे-धीरे उसने अपना चेहरा ऊपर उठाया।

उसका आधा चेहरा जला हुआ था।

और आँखों की जगह सिर्फ काला अंधेरा।

नेहा चीख उठी।

तभी सारे बच्चे एक साथ बोल पड़े—

“इन्होंने दरवाज़ा बंद कर दिया था…”

अचानक आदित्य को दीवार पर लगी पुरानी तस्वीर दिखाई दी।

तस्वीर में यही स्कूल था।

और नीचे लिखा था—

“2006 – दूसरी मंज़िल में आग लगने से 17 बच्चों की मौत।”

आदित्य का गला सूख गया।

मतलब…

ये वही बच्चे थे।

तभी जली हुई टीचर की आवाज़ गूँजी—

“क्लास अभी खत्म नहीं हुई…”

अचानक स्कूल के सारे दरवाज़े अपने आप बंद हो गए।

धड़ाम!

कॉरिडोर में आग की हल्की गंध फैलने लगी।

फिर दीवारों पर काले धुएँ के निशान उभरने लगे।

नेहा रोने लगी।

“हमें यहाँ से निकलना है!”

लेकिन तभी बच्चों ने धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ना शुरू कर दिया।

उनके कदमों की आवाज़ पूरे स्कूल में गूँज रही थी।

धप…

धप…

धप…

आदित्य ने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की।

लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला।

तभी पीछे से जली हुई टीचर की आवाज़ आई—

“आज कोई घर नहीं जाएगा…”

और अचानक स्कूल की घंटी फिर बज उठी—

टन्न्न्न्न!

टन्न्न्न्न!

टन्न्न्न्न!

उस तेज आवाज़ के बीच बच्चों की फुसफुसाहट गूँजने लगी—

“बैठ जाओ…”

“क्लास शुरू हो चुकी है…”

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