मगध का श्रापित सिंहासन

 मगध का श्रापित सिंहासन

करीब 2400 साल पहले…

भारत का सबसे शक्तिशाली राज्य था—मगध। विशाल सेना, ऊँचे महल और सोने से भरे खजाने उसकी ताकत थे। उस समय मगध पर राजा धनानंद का शासन था।

लेकिन उसकी क्रूरता से पूरी प्रजा डरती थी।

वह भारी कर वसूलता, गरीबों को सज़ा देता और अपने दुश्मनों को जिंदा कैद में डाल देता था। महल में कोई भी उसके खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं करता था।

मगर मगध के महल में एक ऐसी चीज़ थी, जिससे खुद राजा धनानंद भी डरता था।

वह था—श्रापित सिंहासन।

कहा जाता था कि सदियों पहले उस सिंहासन पर बैठने वाले एक राजा ने अपने ही भाई की हत्या कर दी थी। मरते समय उसके भाई ने श्राप दिया—

“जो भी लालच और अन्याय के साथ इस सिंहासन पर बैठेगा, उसका अंत भयानक होगा।”

तब से कई राजाओं की रहस्यमयी मौत हो चुकी थी।

लेकिन धनानंद इन बातों को अंधविश्वास मानता था।

महल में एक युवा सैनिक था—वीरसेन।

वह ईमानदार और बहादुर था। उसकी वफादारी के कारण सेनापति भी उससे प्रभावित थे।

एक रात वीरसेन महल की पहरेदारी कर रहा था। तभी उसे राजदरबार से किसी के चिल्लाने की आवाज़ सुनाई दी।

वह दौड़कर अंदर पहुँचा।

दरबार खाली था।

लेकिन सिंहासन के पास ज़मीन पर खून फैला हुआ था।

और वहाँ पड़ा था राजपुरोहित का शव।

उसकी आँखें डर से खुली हुई थीं।

वीरसेन घबरा गया।

अचानक पीछे से आवाज़ आई—

“जो सिंहासन का रहस्य जानने की कोशिश करेगा… उसका यही हाल होगा…”

वीरसेन ने पलटकर देखा।

कोई नहीं था।

पूरा दरबार अंधेरे में डूबा हुआ था।

अगली सुबह पूरे महल में डर फैल गया।

राजा धनानंद गुस्से में चिल्लाया—

“ये किसी दुश्मन की चाल है!”

उसने आदेश दिया कि हत्यारे को तुरंत पकड़ा जाए।

लेकिन कई दिनों तक कोई सुराग नहीं मिला।

उधर वीरसेन के मन में सवाल बढ़ते जा रहे थे।

उस रात उसने गुप्त रूप से राजपुरोहित के कक्ष की तलाशी ली।

वहाँ उसे एक पुराना ताड़पत्र मिला।

उस पर लिखा था—

“सिंहासन के नीचे मृत्यु का द्वार छिपा है।”

वीरसेन हैरान रह गया।

तभी अचानक कमरे का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

दीवारों पर लगे दीपक बुझ गए।

और अंधेरे में किसी की धीमी आवाज़ गूँजी—

“वापस चले जाओ…”

वीरसेन का दिल तेजी से धड़कने लगा। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी।

उसने मशाल जलाई और ताड़पत्र को ध्यान से पढ़ा।

उसमें महल के नीचे बनी एक गुप्त सुरंग का ज़िक्र था।

आधी रात को वीरसेन अकेले उस सुरंग की तलाश में निकल पड़ा।

सिंहासन के पीछे दीवार पर एक छोटा-सा चिन्ह बना था। उसे दबाते ही पत्थर की दीवार खुल गई।

अंदर से ठंडी हवा आई।

वीरसेन मशाल लेकर नीचे उतरने लगा।

सुरंग बहुत पुरानी थी। दीवारों पर अजीब चित्र बने थे—युद्ध, धोखा और खून-खराबे के दृश्य।

कुछ दूर जाने के बाद उसे एक विशाल कक्ष मिला।

कक्ष के बीचों-बीच लोहे की जंजीरों से बंधा एक कंकाल बैठा था।

उसके सिर पर टूटा हुआ मुकुट था।

वीरसेन डर गया।

तभी उसे पीछे कदमों की आवाज़ सुनाई दी।

“आख़िर तुम यहाँ पहुँच ही गए।”

वीरसेन ने पलटकर देखा।

वह महामंत्री शकुनि था।

महामंत्री हँसने लगा।

“सालों से यह रहस्य सिर्फ मुझे पता था।”

“तुमने राजपुरोहित की हत्या की?” वीरसेन ने पूछा।

“हाँ,” शकुनि बोला, “क्योंकि वह सच जान गया था।”

वीरसेन ने गुस्से में तलवार निकाल ली।

“लेकिन क्यों?”

महामंत्री की आँखों में लालच चमक उठा।

“क्योंकि इस सुरंग में मगध का असली खजाना छिपा है।”

उसने कंकाल की तरफ इशारा किया।

“यह वही राजा है जिसने अपने भाई की हत्या की थी। मरने से पहले उसने खजाने का रहस्य यहीं छिपा दिया।”

वीरसेन समझ गया कि सिंहासन का श्राप सिर्फ कहानी नहीं था।

शकुनि बोला—

“आज के बाद मगध का राजा मैं बनूँगा।”

उसने तलवार से हमला कर दिया।

सुरंग में दोनों के बीच भयंकर युद्ध शुरू हो गया।

तलवारों की आवाज़ गूँजने लगी।

शकुनि चालाक था, लेकिन वीरसेन ज्यादा तेज़।

युद्ध के दौरान शकुनि ने गलती से दीवार पर लगी एक मशाल गिरा दी।

अचानक पूरी सुरंग हिलने लगी।

छत से पत्थर टूटकर गिरने लगे।

कंकाल की जंजीरें टूट गईं।

वीरसेन ने देखा कि कंकाल के नीचे एक बड़ा लोहे का संदूक छिपा था।

शकुनि लालच में पागल होकर उसकी तरफ दौड़ा।

“खजाना मेरा है!”

जैसे ही उसने संदूक खोला, अंदर से जहरीली गैस निकलने लगी।

शकुनि दर्द से चीखने लगा।

कुछ ही पलों में वह ज़मीन पर गिर पड़ा।

वीरसेन समझ गया—

यही था श्राप।

लालच से भरा इंसान कभी उस खजाने को नहीं पा सकता था।

सुरंग तेजी से टूट रही थी।

वीरसेन तुरंत बाहर भागा।

उसके बाहर निकलते ही पूरा गुप्त कक्ष धरती में समा गया।

अगली सुबह वीरसेन ने राजा धनानंद को सब सच बता दिया।

लेकिन राजा ने उसकी बात पर विश्वास नहीं किया।

वह हँसकर बोला—

“श्राप जैसी कोई चीज़ नहीं होती।”

उसी रात…

राजा धनानंद अकेले सिंहासन कक्ष में बैठा था।

अचानक महल की सारी मशालें बुझ गईं।

कमरे में ठंडी हवा फैल गई।

और सिंहासन के पीछे से वही आवाज़ गूँजी—

“अन्याय का अंत निश्चित है…”

अगली सुबह जब सैनिक दरबार में पहुँचे…

राजा धनानंद मृत पड़ा था।

उसकी आँखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।

उस दिन के बाद मगध का श्रापित सिंहासन हमेशा के लिए बंद कर दिया गया।

और इतिहास में यह कहानी फैल गई कि सत्ता से बड़ा कोई श्राप नहीं होता।

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