काली बारिश की रात

 काली बारिश की रात

मुंबई से लगभग 70 किलोमीटर दूर एक छोटा-सा कस्बा था—“रामपुर”।

वहाँ हर साल मानसून में तेज़ बारिश होती थी, लेकिन इस बार कुछ अलग होने वाला था।

गाँव के बुज़ुर्ग कहते थे कि हर 25 साल बाद एक ऐसी रात आती है जब आसमान से काली बारिश होती है।

उस रात जो भी इंसान घर से बाहर निकलता… वह अगली सुबह इंसान नहीं रहता।

लोग इस कहानी को सिर्फ अंधविश्वास मानते थे।

लेकिन 19 जुलाई की रात… सब बदल गया।

उस शाम आसमान का रंग अजीब-सा काला हो गया था। बादलों में बिजली चमक रही थी, लेकिन आवाज़ बिल्कुल नहीं आ रही थी।

गाँव का 23 साल का लड़का समर अपने दोस्तों के साथ चाय की दुकान पर बैठा था।

उसका दोस्त रोहन बोला,

“आज रात बाहर मत निकलना। दादा जी कह रहे थे कि आज वही काली बारिश वाली रात है।”

समर हँस पड़ा।

“तुम लोग भी ना… हर चीज़ में भूत ढूँढ लेते हो।”

तभी दुकान पर बैठे बूढ़े रमेश काका अचानक बोले,

“मज़ाक मत करो लड़कों… मैंने वो रात अपनी आँखों से देखी है।”

सब चुप हो गए।

रमेश काका की काँपती आवाज़ गूँजी—

“25 साल पहले… मेरे पिता उस बारिश में बाहर गए थे। अगली सुबह वो वापस आए… लेकिन वो इंसान नहीं रहे।”

समर मुस्कुराया।

“फिर क्या बन गए? भूत?”

काका की आँखें डर से फैल गईं।

“उनकी आँखें पूरी काली हो चुकी थीं… और वो सिर्फ एक ही बात बोल रहे थे—

‘वो आ रहे हैं…’”

इतना कहकर काका दुकान से उठकर चले गए।

रात 11 बजे तक पूरा गाँव खाली हो चुका था। हर घर के दरवाज़े बंद थे। लोग खिड़कियों पर काले कपड़े लगा रहे थे।

लेकिन समर को अब भी इन बातों पर विश्वास नहीं था।

ठीक 12 बजे अचानक आसमान में तेज़ बिजली चमकी।

और फिर बारिश शुरू हुई।

लेकिन वह सामान्य बारिश नहीं थी।

पानी पूरी तरह काला था।

सड़क पर गिरते ही वह धुएँ की तरह फैल रहा था।

समर खिड़की से बाहर देखने लगा। तभी उसे सड़क पर कोई खड़ा दिखाई दिया।

एक लंबा काला साया।

उसकी आँखें सफेद चमक रही थीं।

समर का दिल जोर से धड़कने लगा।

तभी उसके फोन पर मैसेज आया—

“खिड़की से बाहर मत देखो।”

मैसेज रोहन का था।

समर ने तुरंत फोन मिलाया।

“तूने ये मैसेज क्यों भेजा?”

रोहन की डरी हुई आवाज़ आई—

“क्योंकि वो लोगों को देखते ही उनके घर में आ जाते हैं।”

समर हँसना चाहता था… लेकिन तभी उसे महसूस हुआ कि बाहर खड़ा साया अब धीरे-धीरे उसके घर की तरफ बढ़ रहा था।

टप…

टप…

टप…

उसके कदमों की आवाज़ दरवाज़े तक पहुँच गई।

फिर अचानक सब शांत हो गया।

समर ने राहत की साँस ली।

लेकिन तभी…

ठक… ठक… ठक…

दरवाज़े पर दस्तक हुई।

उसकी माँ डरते हुए बोलीं,

“कोई दरवाज़ा नहीं खोलेगा।”

फिर बाहर से आवाज़ आई—

“समर… बेटा दरवाज़ा खोलो।”

वह उसके पिता की आवाज़ थी।

लेकिन उसके पिता तो दो दिन पहले दिल्ली गए थे।

समर की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।

बाहर से फिर आवाज़ आई—

“जल्दी दरवाज़ा खोलो… बारिश बहुत तेज़ है…”

उसकी माँ रोने लगीं।

“ये तुम्हारे पापा नहीं हैं…”

अचानक दरवाज़े पर जोर-जोर से चोट पड़ने लगी।

धड़ाम!

धड़ाम!

धड़ाम!

लकड़ी का दरवाज़ा हिलने लगा।

समर ने खिड़की से झाँकने की गलती कर दी।

और उसका खून जम गया।

बाहर उसके पिता नहीं थे।

वहाँ एक लंबा काला प्राणी खड़ा था। उसका शरीर पूरी तरह पानी की तरह बह रहा था। चेहरे पर सिर्फ दो सफेद आँखें थीं।

वह मुस्कुरा रहा था।

फिर अचानक उसने अपना हाथ लंबा करके खिड़की के अंदर डाल दिया।

समर चीख पड़ा।

उसकी माँ ने तुरंत भगवान की मूर्ति उठाकर मंत्र पढ़ना शुरू कर दिया।

अचानक वह काला हाथ जलने लगा और प्राणी दर्द से चीखता हुआ पीछे हट गया।

लेकिन तभी पूरे गाँव से चीखों की आवाज़ें आने लगीं।

लोग मर रहे थे।

कुछ देर बाद बिजली चली गई।

पूरा घर अंधेरे में डूब गया।

फिर ऊपर छत से किसी के चलने की आवाज़ आने लगी।

टक…

टक…

टक…

समर ने टॉर्च जलाई।

आवाज़ धीरे-धीरे सीढ़ियों की तरफ आने लगी।

फिर अचानक…

उसकी छोटी बहन पायल चीख उठी।

समर भागकर कमरे में पहुँचा।

पायल खिड़की की तरफ देख रही थी।

“भैया… बाहर कोई मुझे बुला रहा है…”

समर ने बाहर देखा।

बारिश में एक छोटी लड़की खड़ी थी।

उसका चेहरा पूरी तरह काला था।

वह मुस्कुरा रही थी।

और बिल्कुल पायल की आवाज़ में बोल रही थी—

“आओ ना… बाहर बहुत मज़ा है…”

पायल जैसे सम्मोहित होकर दरवाज़े की तरफ बढ़ने लगी।

समर ने उसे पकड़ लिया।

लेकिन तभी कमरे की दीवारों से काला पानी रिसने लगा।

पूरा कमरा धीरे-धीरे भरने लगा।

उस पानी से अजीब फुसफुसाहटें आ रही थीं।

“हमारे साथ आ जाओ…”

“हमेशा के लिए…”

समर का दम घुटने लगा।

तभी उसे रमेश काका की बात याद आई—

“रोशनी से वो डरते हैं…”

वह तुरंत स्टोर रूम में भागा और पुराना लालटेन ढूँढने लगा।

पीछे से आवाज़ें लगातार करीब आ रही थीं।

अचानक अंधेरे में किसी ने उसका पैर पकड़ लिया।

समर नीचे गिर पड़ा।

टॉर्च की रोशनी में उसने देखा—

एक औरत उल्टी छत पर रेंग रही थी।

उसकी आँखें नहीं थीं।

मुँह से काला पानी बह रहा था।

समर काँपते हुए पीछे हटने लगा।

औरत फुसफुसाई—

“बारिश खत्म होने से पहले… तुम भी हमारे जैसे बन जाओगे…”

समर ने किसी तरह लालटेन जलाई।

जैसे ही रोशनी फैली, वह औरत चीखते हुए गायब हो गई।

समर लालटेन लेकर वापस कमरे में पहुँचा।

लेकिन वहाँ पहुँचते ही उसके होश उड़ गए।

उसकी माँ और पायल गायब थीं।

कमरे की दीवार पर सिर्फ काले पानी से लिखा था—

“झील के पास आओ…”

बाहर बारिश अब और भी तेज़ हो चुकी थी।

समर लालटेन लेकर गाँव के बाहर वाली पुरानी झील की तरफ भागा।

रास्ते में पूरा गाँव खाली पड़ा था।

कुछ लोग सड़क पर खड़े थे… बिल्कुल शांत।

उनकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

वे धीरे-धीरे समर की तरफ मुड़े।

और एक साथ बोले—

“तुम देर से आए…”

समर डर के मारे भागने लगा।

आखिरकार वह झील तक पहुँचा।

लेकिन वहाँ जो उसने देखा… उससे उसकी चीख निकल गई।

झील के बीचों-बीच सैकड़ों काले साये खड़े थे।

और उनके बीच उसकी माँ और पायल भी थीं।

उनकी आँखें अब पूरी तरह काली हो चुकी थीं।

तभी झील का पानी हिलने लगा।

धीरे-धीरे उसमें से एक विशाल आकृति बाहर आई।

वह इंसान नहीं थी।

उसका शरीर बारिश से बना हुआ था।

हजारों आवाज़ें एक साथ उसके अंदर से निकल रही थीं।

वह समर की तरफ देखकर बोली—

“हर 25 साल बाद… हमें नए लोग चाहिए…”

समर पीछे हटने लगा।

लेकिन तभी उसकी माँ मुस्कुराईं।

और बोलीं—

“अब तुम भी हमारे साथ रहोगे…”

अचानक झील का काला पानी तेजी से समर की तरफ बढ़ा।

उसकी चीख रात के अंधेरे में गूँज उठी।

अगली सुबह बारिश रुक चुकी थी।

पूरा गाँव खाली था।

पुलिस को वहाँ कोई इंसान नहीं मिला।

बस झील के किनारे एक कैमरा पड़ा था।

कैमरे की आखिरी रिकॉर्डिंग में सिर्फ एक चीज़ दिखाई दे रही थी—

काले पानी में खड़ा समर…

जिसकी आँखें अब पूरी तरह काली हो चुकी थीं।

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