चाँदनी झील का द्वार

 प्राचीन रहस्य — “चाँदनी झील का द्वार”

हिमाचल प्रदेश के ऊँचे पहाड़ों के बीच एक रहस्यमयी झील थी—“चाँदनी झील”।

दिन में वह झील बिल्कुल साधारण दिखती थी, लेकिन पूर्णिमा की रात उसका पानी चाँदी की तरह चमकने लगता था। गाँव के लोग कहते थे कि झील के नीचे एक प्राचीन द्वार छुपा है, जो हर सौ साल में सिर्फ एक रात के लिए खुलता है।

और जो भी उस द्वार के अंदर गया… वह कभी वापस नहीं लौटा।

पास के गाँव “रूपगढ़” में 18 साल का दक्ष रहता था। उसे बचपन से रहस्यमयी कहानियाँ सुनने का शौक था। उसकी दादी अक्सर कहती थीं—

“उस झील में सिर्फ पानी नहीं… पुरानी आत्माओं का संसार छुपा है।”

दक्ष हमेशा इन बातों को अंधविश्वास मानता था।

लेकिन एक दिन उसकी जिंदगी बदल गई।

दादी की मृत्यु के बाद उसे उनकी पुरानी संदूक मिली। उसमें एक चाँदी का लॉकेट और एक अधूरा पत्र रखा था।

पत्र में लिखा था—

“दक्ष, अगर यह पत्र तुम्हारे हाथ में पहुँचे, तो समझो समय आ गया है। तुम्हारे दादा चाँदनी झील के रहस्य को खोजते हुए गायब हुए थे। सच्चाई झील के नीचे छुपी है… लेकिन याद रखना— द्वार खुलने के बाद सूर्योदय से पहले लौटना जरूरी है।”

पत्र पढ़ते ही दक्ष की धड़कन तेज हो गई।

उसी रात पूर्णिमा थी।

दक्ष ने अपने दोस्त युवी को सारी बात बताई। युवी पहले तो हँसा, लेकिन जब उसने लॉकेट पर बने अजीब चिन्ह देखे, तो गंभीर हो गया।

दोनों रात को चुपके से झील की तरफ निकल पड़े।

पहाड़ों के बीच फैली झील आज अलग दिख रही थी। उसका पानी नीली रोशनी से चमक रहा था।

हवा बिल्कुल शांत थी।

अचानक झील के बीच हलचल होने लगी।

धीरे-धीरे पानी दो हिस्सों में बँटने लगा और नीचे पत्थरों की सीढ़ियाँ दिखाई देने लगीं।

युवी डर गया। “ये… ये कैसे हो सकता है?”

दक्ष फुसफुसाया, “दादी सच कहती थीं।”

दोनों सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे।

जैसे-जैसे वे नीचे जाते, पानी उनके ऊपर बंद होता जा रहा था। लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि उन्हें साँस लेने में कोई दिक्कत नहीं हो रही थी।

नीचे पहुँचकर उन्होंने जो देखा, उससे उनकी आँखें फैल गईं।

वहाँ एक पूरा शहर था।

पत्थर के घर… नीले चमकते पेड़… और हवा में तैरती हुई अजीब रोशनियाँ।

लेकिन शहर खाली था।

पूरा शहर मौत जैसी खामोशी में डूबा था।

तभी दूर से किसी लड़की के गाने की आवाज आई।

धीमी… डरावनी…

युवी काँप उठा। “हमें वापस चलना चाहिए।”

लेकिन दक्ष उस आवाज की तरफ बढ़ने लगा।

कुछ देर बाद वे एक विशाल मंदिर के सामने पहुँचे।

मंदिर के दरवाजे पर वही चिन्ह बना था, जो लॉकेट पर था।

दक्ष ने लॉकेट दरवाजे से लगाया।

गड़गड़ाहट के साथ दरवाजा खुल गया।

अंदर हजारों दीपक जल रहे थे।

मंदिर के बीचों-बीच एक पत्थर का सिंहासन था… और उस पर बैठी थी एक लड़की।

उसके लंबे सफेद बाल थे और आँखें नीली चमक रही थीं।

वह धीरे-धीरे उठी।

“आखिर तुम आ ही गए…”

उसकी आवाज पूरे मंदिर में गूँज उठी।

दक्ष चौंक गया। “तुम कौन हो?”

लड़की मुस्कुराई।

“मैं आर्या हूँ। इस श्रापित नगर की अंतिम रक्षक।”

युवी ने धीरे से पूछा, “ये जगह क्या है?”

आर्या की आँखें उदास हो गईं।

“सदियों पहले यह नगर जीवित था। लोग यहाँ एक रहस्यमयी शक्ति की पूजा करते थे। लेकिन राजा ने उस शक्ति को अपने नियंत्रण में करने की कोशिश की।”

“फिर क्या हुआ?” दक्ष ने पूछा।

“पूरे नगर को श्राप मिल गया,” आर्या बोली। “हम सब समय के अंदर कैद हो गए।”

तभी अचानक मंदिर काँपने लगा।

दीपक बुझने लगे।

आर्या घबरा गई। “वह जाग चुका है…”

“कौन?” युवी ने डरते हुए पूछा।

अचानक मंदिर के पीछे अंधेरे में दो विशाल लाल आँखें चमकीं।

एक भारी गुर्राहट गूँजी।

धीरे-धीरे अंधेरे से एक विशाल काला प्राणी बाहर आया। उसका शरीर इंसान जैसा था, लेकिन चेहरा किसी दैत्य जैसा।

उसकी लंबी उंगलियाँ जमीन को खरोंच रही थीं।

युवी डर के मारे पीछे हट गया।

“ये क्या है?”

आर्या बोली, “यह श्राप का रक्षक है। जो भी इस नगर से बाहर जाने की कोशिश करता है… यह उसे मार देता है।”

प्राणी तेजी से उनकी तरफ दौड़ा।

दक्ष और युवी भागने लगे।

मंदिर के गलियारों में उनके कदमों की आवाज गूँज रही थी।

पीछे वह दैत्य दीवारें तोड़ता हुआ आ रहा था।

आर्या चिल्लाई, “झील का द्वार बंद होने वाला है!”

वे शहर की तरफ भागे।

पूरा नगर अब जाग चुका था।

खिड़कियों में परछाइयाँ दिखाई दे रही थीं।

हवा में चीखें गूँज रही थीं।

जैसे हजारों आत्माएँ मदद माँग रही हों।

दक्ष ने पीछे मुड़कर देखा— दैत्य बस कुछ ही कदम दूर था।

तभी आर्या रुकी।

“मैं इसे रोकूँगी,” उसने कहा।

दक्ष चौंक गया। “नहीं! तुम भी चलो!”

आर्या हल्का सा मुस्कुराई। “मैं इस नगर से बंधी हूँ। लेकिन तुम अभी भी आजाद हो।”

उसने अपने हाथ उठाए।

नीली रोशनी पूरे शहर में फैल गई।

दैत्य दर्द से चीख उठा।

“भागो!” आर्या चिल्लाई।

दक्ष और युवी सीढ़ियों की तरफ दौड़ पड़े।

पीछे पूरा नगर काँप रहा था।

जैसे ही वे ऊपर पहुँचे, झील का पानी फिर बंद होने लगा।

दोनों किसी तरह बाहर निकल आए।

थके हुए वे झील किनारे गिर पड़े।

सूरज निकल चुका था।

कुछ मिनटों तक दोनों चुप रहे।

फिर युवी बोला, “क्या… वो सब सच था?”

दक्ष ने जवाब नहीं दिया।

उसने अपनी मुट्ठी खोली।

उसके हाथ में वही चाँदी का लॉकेट था…

लेकिन अब उसमें हल्की नीली चमक थी।

और उसी पल, झील के पानी के नीचे से फिर वही लड़की की आवाज गूँजी—

“द्वार फिर खुलेगा…”

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