ब्लैकआउट
साल 2023।
दिल्ली शहर हमेशा की तरह रोशनी से चमक रहा था। सड़कें भरी हुई थीं, लोग अपने-अपने काम में व्यस्त थे।
लेकिन किसी को नहीं पता था…
कुछ घंटों बाद पूरा शहर अंधेरे में डूबने वाला है।
अंकित अपने दोस्तों के साथ एक छोटे फ्लैट में रहता था। उस रात सब लोग मूवी देख रहे थे।
अचानक—
पूरे इलाके की बिजली चली गई।
“यार फिर से लाइट चली गई…” राहुल चिढ़कर बोला।
लेकिन इस बार कुछ अलग था।
सिर्फ़ उनका फ्लैट नहीं…
पूरा शहर अंधेरे में था।
खिड़की से बाहर देखने पर दूर-दूर तक सिर्फ़ काला सन्नाटा दिखाई दे रहा था।
मोबाइल नेटवर्क भी गायब था।
टीवी बंद।
इंटरनेट बंद।
सब कुछ बंद।
“ये नॉर्मल नहीं है…” अंकित धीरे से बोला।
तभी नीचे सड़क से किसी के चीखने की आवाज़ आई।
सब लोग खिड़की के पास भागे।
नीचे एक आदमी सड़क पर दौड़ रहा था।
वो लगातार चिल्ला रहा था—
“दरवाज़े बंद करो!!! बाहर मत निकलना!!!”
अचानक…
कुछ काला-सा साया पीछे से आया…
और वो आदमी अंधेरे में गायब हो गया।
चीख भी बंद।
सड़क फिर शांत।
फ्लैट के अंदर सन्नाटा छा गया।
सोनिया डरते हुए बोली—
“वो क्या था…?”
किसी के पास जवाब नहीं था।
तभी रेडियो अपने आप चालू हो गया।
उसमें से टूटी हुई आवाज़ आने लगी—
“सभी लोग… अपने घरों में रहें… खिड़कियाँ बंद रखें… अंधेरे में किसी आवाज़ का जवाब मत दें…”
फिर अचानक रेडियो बंद हो गया।
राहुल हँसने की कोशिश करने लगा—
“ये कोई प्रैंक होगा…”
तभी—
ठक…
ठक…
ठक…
फ्लैट के मुख्य दरवाज़े पर दस्तक हुई।
सब चुप हो गए।
दस्तक फिर हुई।
“अंकित… दरवाज़ा खोलो…”
ये आवाज़ अंकित की माँ की थी।
लेकिन अंकित की माँ तो गाँव में थीं।
उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
“ये… ये कैसे हो सकता है…”
बाहर से फिर आवाज़ आई—
“बेटा… जल्दी दरवाज़ा खोलो… मुझे डर लग रहा है…”
सोनिया रोने लगी।
“मत खोलना…”
लेकिन आवाज़ बिल्कुल असली लग रही थी।
अंकित का दिल टूटने लगा।
“माँ…?”
तभी राहुल ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“रेडियो ने क्या कहा था याद है?”
बाहर अचानक आवाज़ बदल गई।
अब वो भारी और डरावनी हो चुकी थी—
“दरवाज़ा खोलो…”
धड़ाम!
दरवाज़ा ज़ोर से हिला।
धड़ाम!
इस बार और ज़ोर से।
जैसे कोई बहुत ताकतवर चीज़ बाहर खड़ी हो।
फ्लैट की लाइट्स एक सेकंड के लिए जलीं…
और उसी पल सबने दरवाज़े के नीचे एक काली परछाई देखी।
जिसके पैर इंसानों जैसे नहीं थे।
सोनिया चीख पड़ी।
अचानक सब शांत हो गया।
कुछ सेकंड तक सिर्फ़ उनकी साँसों की आवाज़ आ रही थी।
फिर…
धीरे-धीरे खिड़की के बाहर किसी के चलने की आवाज़ आने लगी।
टक…
टक…
टक…
लेकिन उनका फ्लैट सातवीं मंज़िल पर था।
बाहर कोई चल कैसे सकता था?
राहुल ने हिम्मत करके पर्दा थोड़ा हटाया।
और तुरंत पीछे गिर पड़ा।
उसका चेहरा सफेद पड़ चुका था।
“क्या देखा?!” अंकित चिल्लाया।
राहुल काँपते हुए बोला—
“कोई… दीवार पर चल रहा है…”
अचानक खिड़की पर किसी का चेहरा दिखाई दिया।
पूरी तरह काला।
सिर्फ़ दो सफेद आँखें।
वो चीज़ खिड़की से अंदर झाँक रही थी।
और मुस्कुरा रही थी।
धड़ाम!
खिड़की का शीशा टूट गया।
सब लोग चीखते हुए पीछे भागे।
वो काला साया धीरे-धीरे कमरे में घुसने लगा।
उसका शरीर इंसान जैसा था…
लेकिन बहुत लंबा।
हाथ जमीन तक लटक रहे थे।
और उसकी गर्दन उल्टी दिशा में मुड़ी हुई थी।
अंकित ने तुरंत टॉर्च उसकी तरफ़ मारी।
साया अचानक पीछे हट गया।
जैसे उसे रोशनी से डर लगता हो।
“रोशनी!” अंकित चिल्लाया, “इसे रोशनी से डर लगता है!”
सबने मोबाइल की फ्लैशलाइट ऑन कर दी।
साया चीखने लगा।
उसकी आवाज़ इंसानों जैसी नहीं थी।
धीरे-धीरे वो पीछे हटकर अंधेरे में गायब हो गया।
सबने राहत की साँस ली।
लेकिन तभी…
पूरा फ्लैट फिर अंधेरे में डूब गया।
मोबाइल बंद।
टॉर्च बंद।
कुछ भी काम नहीं कर रहा था।
और फिर…
कमरे के बीचोंबीच किसी की साँस लेने की आवाज़ आई।
ह्ह्ह्ह…
ह्ह्ह्ह…
कोई उनके बीच खड़ा था।
अंकित काँपते हुए बोला—
“क… कौन है?”
तभी उसके कान के पास एक आवाज़ आई—
“अब… तुम्हारी रोशनी खत्म…”
अचानक सोनिया की चीख गूँजी।
फिर राहुल की।
फिर सब शांत।
अगली सुबह…
पूरे शहर की बिजली वापस आ गई।
लोग धीरे-धीरे अपने घरों से बाहर निकले।
लेकिन हजारों लोग गायब थे।
उनमें अंकित और उसके दोस्त भी थे।
पुलिस को उनके फ्लैट में सिर्फ़ एक चीज़ मिली—
दीवार पर काले हाथों के निशान।
और बीच में खून से लिखा था—
“अंधेरा अभी गया नहीं है…”
उस रात के बाद…
हर साल उसी तारीख़ पर…
दिल्ली के कुछ इलाकों की बिजली ठीक 12 बजे चली जाती है।
और लोग कहते हैं—
अगर अंधेरे में कोई तुम्हारा नाम पुकारे…
तो जवाब मत देना। 👁️
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