छत पर चलने वाली परछाई

 छत पर चलने वाली परछाई

भोपाल के एक पुराने मोहल्ले में एक तीन मंज़िला मकान था। उस घर की सबसे अजीब बात यह थी कि हर रात ठीक 2 बजे उसकी छत पर किसी के चलने की आवाज़ आती थी।

ठक…

ठक…

ठक…

लेकिन वहाँ कोई दिखाई नहीं देता था।

लोग कहते थे कि उस घर की छत पर एक परछाई घूमती है, जो किसी को भी अपने साथ ले जाती है।

उस मकान में हाल ही में आदित्य अपने परिवार के साथ रहने आया था। उसे भूत-प्रेत जैसी बातों पर बिल्कुल विश्वास नहीं था।

पहली रात सब सामान्य था।

लेकिन ठीक 2 बजे…

उसे छत पर कदमों की आवाज़ सुनाई दी।

ठक…

ठक…

ठक…

आदित्य उठकर बैठ गया।

“शायद बिल्ली होगी,” उसने सोचा।

लेकिन आवाज़ बहुत भारी थी… जैसे कोई इंसान धीरे-धीरे चल रहा हो।

अगली रात फिर वही हुआ।

इस बार उसकी छोटी बहन ने डरते हुए कहा—

“भैया… कोई छत पर चल रहा है।”

आदित्य टॉर्च लेकर ऊपर गया।

छत पूरी खाली थी।

लेकिन धूल में ताज़ा पैरों के निशान बने हुए थे।

और सबसे डरावनी बात—

वे निशान छत के किनारे जाकर खत्म हो गए थे।

जैसे कोई वहाँ से नीचे कूद गया हो।

अगले दिन पड़ोस की बूढ़ी औरत ने आदित्य की माँ को चेतावनी दी—

“रात 2 बजे छत पर मत जाना… वरना वो तुम्हें देख लेगी।”

“कौन?” माँ ने पूछा।

बूढ़ी औरत धीरे से बोली—

“वो लड़की… जो दस साल पहले यहाँ से गिरी थी।”

उस रात आदित्य ने सच जानने का फैसला किया।

उसने कैमरा छत पर लगा दिया और खुद सीढ़ियों के पीछे छिपकर बैठ गया।

घड़ी में 1:59 हुए।

पूरा घर शांत था।

फिर…

ठक…

ठक…

ठक…

आवाज़ फिर शुरू हुई।

लेकिन इस बार कदमों की आवाज़ कैमरे के ठीक सामने आकर रुक गई।

आदित्य ने डरते हुए कैमरे की स्क्रीन देखी।

स्क्रीन पर कोई नहीं था।

लेकिन धूल अपने आप दब रही थी… जैसे कोई अदृश्य चीज़ चल रही हो।

अचानक कैमरे में एक काली परछाई दिखाई दी।

लंबे बाल…

सफेद कपड़े…

और चेहरा पूरी तरह धुंधला।

आदित्य का गला सूख गया।

वह धीरे-धीरे पीछे हटने लगा।

तभी उसके पीछे किसी ने फुसफुसाया—

“तुम मुझे देख सकते हो?”

आदित्य ने पलटकर देखा।

वही लड़की उसके बिल्कुल पीछे खड़ी थी।

उसकी आँखें पूरी काली थीं।

आदित्य डरकर नीचे भागा और अपने कमरे में दरवाज़ा बंद कर लिया।

लेकिन कुछ सेकंड बाद…

छत पर चलने की आवाज़ बंद हो गई।

अब आवाज़ उसके कमरे के बाहर से आ रही थी।

ठक…

ठक…

ठक…

धीरे-धीरे आवाज़ दरवाज़े के सामने आकर रुक गई।

फिर बाहर से धीमी आवाज़ आई—

“दरवाज़ा खोलो… मैं अकेली हूँ…”

आदित्य काँपने लगा।

तभी उसकी नज़र कैमरे की लाइव रिकॉर्डिंग पर पड़ी।

स्क्रीन में दिख रहा था कि उसके कमरे के बाहर कोई नहीं था।

लेकिन दरवाज़े पर अपने आप खरोंचें बन रही थीं।

चररर…

चररर…

और फिर दरवाज़े पर धीरे-धीरे एक लाइन उभरी—

“अब तुम्हारी बारी है।”

अचानक पूरे घर की लाइट चली गई।

अंधेरे में सिर्फ एक आवाज़ गूँजी—

ठक…

ठक…

ठक…

और फिर सब शांत हो गया।

सुबह आदित्य अपने कमरे में नहीं मिला।

दरवाज़ा अंदर से बंद था।

लेकिन छत की धूल में एक नए पैरों के निशान बने थे…

जो धीरे-धीेरे छत पर घूम रहे थे।

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