आधी रात का लाइव

 आधी रात का लाइव

राहुल एक छोटा यूट्यूबर था। उसके चैनल पर मुश्किल से पाँच हजार सब्सक्राइबर थे। वह रोज़ नई हॉरर जगहों पर जाकर लाइव करता था, लेकिन कोई वीडियो ज़्यादा नहीं चलता था।

एक रात उसे एक अनजान ईमेल मिला।

“अगर सच में डर दिखाना है, तो रात 12 बजे पुरानी ‘वर्मा फैक्ट्री’ में लाइव शुरू करो।”

ईमेल के नीचे सिर्फ एक लाइन और लिखी थी—

“कैमरा कभी बंद मत करना।”

राहुल को लगा कोई मज़ाक कर रहा है, लेकिन वायरल होने के लिए उसने जाने का फैसला कर लिया।

रात 11:45 पर वह अपने दोस्त अमन के साथ फैक्ट्री पहुँचा। फैक्ट्री शहर से दूर जंगल के पास थी। टूटी दीवारें, जंग लगे गेट और अंदर गहरा अंधेरा।

“भाई, ये जगह सही नहीं लग रही,” अमन ने कहा।

“बस आधा घंटा लाइव करेंगे,” राहुल बोला।

12 बजते ही लाइव शुरू हुआ।

मोबाइल स्क्रीन पर धीरे-धीरे लोग जुड़ने लगे।

“दोस्तों, आज हम इंडिया की सबसे डरावनी फैक्ट्री में हैं,” राहुल कैमरे में बोला।

अचानक पीछे कहीं लोहे के गिरने की तेज आवाज़ आई।

ठाआआंग!

अमन डरकर उछल पड़ा।

“कोई है वहाँ?” राहुल ने टॉर्च घुमाई।

लेकिन वहाँ कुछ नहीं था।

लाइव चैट में कमेंट आने लगे—

“पीछे कौन खड़ा है?”

“भाई सफेद कपड़ों वाली औरत दिखी!”

“भागो वहाँ से!”

राहुल ने पीछे मुड़कर देखा। वहाँ सिर्फ टूटी मशीनें थीं।

“लोग मज़ाक कर रहे हैं,” उसने हँसने की कोशिश की।

तभी कैमरे की स्क्रीन कुछ सेकंड के लिए ब्लैक हो गई।

और जब वापस आई…

स्क्रीन पर राहुल और अमन के पीछे कोई तीसरा इंसान खड़ा था।

लंबा… दुबला… और उसका चेहरा पूरी तरह काला।

अमन चीख पड़ा।

दोनों भागते हुए दूसरे कमरे में पहुँचे और दरवाज़ा बंद कर लिया।

दोनों की साँसें तेज चल रही थीं।

“तूने देखा था?” अमन काँपते हुए बोला।

राहुल कुछ बोल ही रहा था कि मोबाइल से आवाज़ आई—

“मैं अभी भी तुम्हारे पीछे हूँ…”

दोनों ने धीरे-धीरे स्क्रीन की तरफ देखा।

लाइव चैट अपने आप चल रही थी।

लेकिन अब कमेंट दर्शक नहीं लिख रहे थे।

हर कमेंट एक ही नाम से आ रहा था—

“Rakesh_1998”

और हर मैसेज में लिखा था—

“दरवाज़ा मत खोलना।”

राहुल ने प्रोफाइल खोलने की कोशिश की।

तभी स्क्रीन पर एक पुरानी फोटो दिखाई दी।

उसमें यही फैक्ट्री थी… और चार लोग खड़े थे।

उनमें से एक बिल्कुल राहुल जैसा दिख रहा था।

“ये… ये मैं कैसे हो सकता हूँ?” राहुल घबरा गया।

अमन ने फोटो ज़ूम की।

फोटो के कोने में तारीख लिखी थी—

“14 जुलाई 1998”

अचानक कमरे के बाहर किसी के चलने की आवाज़ आने लगी।

ठक…

ठक…

ठक…

धीरे-धीरे आवाज़ दरवाज़े के पास आकर रुक गई।

फिर बाहर से भारी आवाज़ आई—

“लाइव बंद क्यों कर दिया?”

राहुल के हाथ काँपने लगे।

“भाई… हमने तो लाइव बंद ही नहीं किया…” अमन फुसफुसाया।

मोबाइल स्क्रीन पर अचानक व्यूअर्स की संख्या बढ़ने लगी।

10 हजार…

50 हजार…

1 लाख…

लेकिन चैट में सिर्फ एक ही मैसेज बार-बार आ रहा था—

“दरवाज़ा खुलने वाला है…”

अचानक कमरे की लाइट अपने आप जल उठी।

और दीवार पर खून से लिखा था—

“1998 में भी यही हुआ था।”

तभी राहुल को याद आया।

उसके पिता ने बचपन में बताया था कि इस फैक्ट्री में आग लगी थी और चार लोग अंदर फँसकर गायब हो गए थे।

उनमें से एक का नाम था—

राकेश।

उसी समय मोबाइल पर नया मैसेज आया—

“मैं अकेला नहीं मरना चाहता था…”

दरवाज़ा धीरे-धीरे खुलने लगा।

चरररर…

अमन रोने लगा।

राहुल ने पूरी ताकत से दरवाज़ा पकड़ा, लेकिन बाहर से कोई उसे धक्का दे रहा था।

फिर अचानक लाइव स्क्रीन पर एक चेहरा दिखाई दिया।

जला हुआ चेहरा…

काली आँखें…

और होंठों पर अजीब मुस्कान।

स्क्रीन से वही आवाज़ आई—

“अब तुम्हारी बारी है…”

अचानक मोबाइल बंद हो गया।

पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।

उस रात के बाद राहुल और अमन कभी वापस नहीं मिले।

लेकिन इंटरनेट पर आज भी एक वीडियो मौजूद है—

“Midnight Factory Live”

वीडियो में आखिरी 10 सेकंड में सिर्फ अंधेरा दिखता है।

और फिर एक धीमी फुसफुसाहट सुनाई देती है—

“कैमरा कभी बंद मत करना…”

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