तहखाने का दरवाज़ा

 तहखाने का दरवाज़ा

राजस्थान के रेगिस्तान के बीच एक पुरानी हवेली थी—“राठौड़ निवास”। हवेली इतनी विशाल थी कि लोग कहते थे उसके अंदर रास्ते भूल जाना आसान था। सालों पहले वहाँ रहने वाला पूरा परिवार अचानक गायब हो गया था। तब से हवेली वीरान पड़ी थी।

गाँव वाले उस जगह के पास भी नहीं जाते थे।

कहते थे कि हवेली के नीचे एक तहखाना है, जहाँ आधी रात के बाद किसी के रोने की आवाज़ आती है।

18 साल का करण इन कहानियों पर विश्वास नहीं करता था। वह अपने दोस्तों के साथ रोमांचक जगहों की खोज करता रहता था। जब उसने हवेली के बारे में सुना, तो तुरंत वहाँ जाने की जिद पकड़ ली।

उसके साथ उसके तीन दोस्त थे—समीर, विकास और अंश।

गाँव के बुजुर्ग ने उन्हें रोकते हुए कहा—

“सूरज डूबने से पहले वापस आ जाना… और अगर नीचे तहखाने का दरवाज़ा दिखे, तो उसे कभी मत खोलना।”

करण मुस्कुराया।

“डरिए मत बाबा, हम बस वीडियो बनाकर लौट आएँगे।”

शाम होते-होते चारों हवेली पहुँच गए।

हवेली की टूटी दीवारें, धूल से भरे कमरे और मकड़ी के जाले देखकर ही डर लगने लगा। अंदर अजीब सन्नाटा था।

समीर ने धीमे से कहा—

“मुझे यहाँ अच्छा नहीं लग रहा।”

लेकिन करण आगे बढ़ता गया।

तीसरे कमरे में पहुँचते ही उन्हें फर्श पर लोहे की एक बड़ी जंजीर दिखाई दी। जंजीर जमीन के बीच बने लकड़ी के दरवाज़े से बंधी थी।

“यही होगा तहखाना,” करण बोला।

अंश डर गया।

“चलो यहाँ से।”

तभी नीचे से किसी के धीरे-धीरे दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ आई।

ठक… ठक… ठक…

चारों एकदम चुप हो गए।

फिर एक कमजोर आवाज़ सुनाई दी—

“मुझे बाहर निकालो…”

समीर पीछे हट गया।

“ये इंसान की आवाज़ नहीं लग रही।”

लेकिन करण का रोमांच बढ़ चुका था।

उसने जंजीर हटाई और धीरे-धीरे दरवाज़ा खोला।

जैसे ही दरवाज़ा खुला, नीचे से बर्फ जैसी ठंडी हवा निकली। सीढ़ियाँ अंधेरे में नीचे जा रही थीं।

चारों ने टॉर्च जलाकर नीचे उतरना शुरू किया।

तहखाना बहुत बड़ा था। दीवारों पर पुराने चित्र बने थे। बीच में लोहे का एक पिंजरा रखा था।

और सबसे डरावनी बात…

पिंजरे के अंदर कोई बैठा था।

लंबे बाल, फटे कपड़े और झुका हुआ सिर।

विकास काँप गया।

“ये… ये कौन है?”

तभी वह आकृति धीरे-धीरे खड़ी हुई।

उसका चेहरा देखकर चारों की चीख निकल गई।

उसकी आँखें पूरी काली थीं।

और होंठों पर अजीब मुस्कान थी।

“इतने साल बाद… किसी ने दरवाज़ा खोला है…” उसने भारी आवाज़ में कहा।

करण पीछे हटने लगा।

“चलो यहाँ से!”

लेकिन तभी ऊपर का दरवाज़ा अपने-आप बंद हो गया।

धड़ाम!

पूरा तहखाना अंधेरे में डूब गया।

अब सिर्फ उस आदमी की हँसी गूँज रही थी।

हाहाहाहा…

अंश रोने लगा।

“हमें जाने दो!”

तभी दीवारों पर बने चित्र चमकने लगे। उन चित्रों में वही लोग दिखाई दे रहे थे जो सालों पहले गायब हुए थे।

और अचानक…

उनकी आँखें खुल गईं।

चित्रों में कैद लोग दीवारों से बाहर निकलने लगे।

समीर चीखा—

“भागो!”

चारों अंधेरे में सीढ़ियों की तरफ दौड़े। लेकिन सीढ़ियाँ गायब थीं।

अब तहखाने में सिर्फ एक लंबा गलियारा था।

पीछे से कदमों की आवाज़ आ रही थी।

टक… टक… टक…

करण ने पीछे मुड़कर देखा।

वही काली आँखों वाला आदमी धीरे-धीरे उनकी तरफ आ रहा था।

लेकिन अब वह अकेला नहीं था।

उसके पीछे दर्जनों परछाइयाँ थीं।

विकास डर के मारे गिर पड़ा। तभी एक परछाईं ने उसका पैर पकड़ लिया और अंधेरे में घसीट लिया।

उसकी चीख पूरे तहखाने में गूँज उठी।

“बचाओऽऽऽ!”

फिर सब शांत हो गया।

अब सिर्फ तीन लोग बचे थे।

करण, समीर और अंश।

वे दौड़ते-दौड़ते एक पुराने कमरे में पहुँचे। कमरे के बीच एक टूटा हुआ आईना रखा था।

आईने पर खून से लिखा था—

“जो अंदर आया… वो कभी बाहर नहीं जाएगा…”

अचानक आईने में तीनों की परछाईं दिखनी बंद हो गई।

लेकिन उनके पीछे…

कोई खड़ा था।

तीनों धीरे-धीरे पीछे मुड़े।

वही आदमी उनके सामने था।

उसने मुस्कुराते हुए कहा—

“अब तुम लोग इस हवेली का हिस्सा बनोगे।”

तभी उसकी काली आँखों से खून बहने लगा।

अंश जोर से चीखा और आईना उठाकर उसकी तरफ फेंक दिया।

आईना टूटते ही पूरा तहखाना हिलने लगा।

दीवारें दरकने लगीं।

समीर चिल्लाया—

“भागो!”

तीनों अंधेरे में भागने लगे। अचानक सामने ऊपर जाने वाली सीढ़ियाँ दिखाई दीं।

वे पूरी ताकत से ऊपर भागे और हवेली से बाहर निकल आए।

जैसे ही वे बाहर पहुँचे…

पूरा तहखाना ज़मीन के अंदर धँस गया।

तीनों जमीन पर गिर पड़े। उनकी साँसें तेज चल रही थीं।

लेकिन तभी करण ने देखा…

समीर और अंश उसे अजीब नजरों से देख रहे थे।

उनकी आँखें धीरे-धीरे पूरी काली हो रही थीं।

और उनके होंठों पर वही डरावनी मुस्कान फैल गई…

समीर धीरे से बोला—

“दरवाज़ा फिर खुल चुका है…”

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