आधी रात की बस

 आधी रात की बस

सर्दियों की काली रात थी। घना कोहरा पूरे हाईवे पर फैला हुआ था। सड़क इतनी सुनसान थी कि दूर-दूर तक कोई गाड़ी दिखाई नहीं दे रही थी।

रोहित अपनी नौकरी के इंटरव्यू के लिए दूसरे शहर जा रहा था। उसकी ट्रेन छूट चुकी थी, इसलिए उसे मजबूरी में रात वाली पुरानी बस पकड़नी पड़ी।

बस स्टैंड लगभग खाली था।

सिर्फ़ एक पुरानी, जंग लगी बस खड़ी थी।

उस पर नंबर लिखा था—

“13”

रोहित ने कंडक्टर से पूछा—“ये बस शिवनगर जाएगी?”

कंडक्टर ने धीरे से सिर हिलाया।

उसका चेहरा अजीब था। आँखें बिल्कुल फीकी।

“जल्दी बैठो… बस रुकती नहीं है।”

रोहित को बात थोड़ी अजीब लगी, लेकिन वो बस में चढ़ गया।

बस के अंदर बहुत कम लोग थे।

एक बूढ़ी औरत…

एक आदमी जो लगातार खिड़की के बाहर देख रहा था…

और आख़िरी सीट पर एक छोटी लड़की।

लड़की के हाथ में पुराना टेडी बियर था।

बस धीरे-धीरे चलने लगी।

कुछ देर तक सब शांत रहा।

फिर रोहित ने महसूस किया—

बस बहुत तेज़ जा रही थी।

इतनी तेज़ कि बाहर के पेड़ सिर्फ़ धुंधले साए लग रहे थे।

उसने ड्राइवर को आवाज़ दी—

“भैया, थोड़ा धीरे चलाओ!”

लेकिन ड्राइवर ने कोई जवाब नहीं दिया।

रोहित आगे गया।

और जैसे ही उसने ड्राइवर का चेहरा देखा…

उसकी साँस रुक गई।

ड्राइवर की आँखें नहीं थीं।

सिर्फ़ काला खालीपन।

रोहित डरकर पीछे हट गया।

तभी पीछे से बूढ़ी औरत बोली—

“शोर मत करो… उसे गुस्सा पसंद नहीं…”

रोहित काँपने लगा।

“ये… ये क्या है?”

औरत धीमे से हँसी।

“अब बहुत देर हो चुकी है…”

अचानक बस के अंदर की लाइट्स टिमटिमाने लगीं।

छोटी लड़की धीरे-धीरे अपनी सीट से उठी।

उसने रोहित को देखा…

और मुस्कुराई।

लेकिन वो मुस्कान इंसानी नहीं थी।

उसके दाँत बहुत लंबे थे।

“तुम नए हो ना?” उसने पूछा।

रोहित पीछे हट गया।

“मुझे उतरना है!”

कंडक्टर अचानक उसके सामने आ गया।

“इस बस से कोई नहीं उतरता।”

रोहित ने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की।

लेकिन दरवाज़ा जैसे लोहे की दीवार बन चुका था।

बस अब घने जंगल के बीच से गुजर रही थी।

बाहर सिर्फ़ अंधेरा था।

तभी—

रोहित ने सड़क किनारे कुछ देखा।

कई लोग खड़े थे।

सफेद कपड़ों में।

सब बस को घूर रहे थे।

और जैसे ही बस उनके पास से गुज़री…

सबने एक साथ अपनी गर्दन घुमा दी।

पूरी 180 डिग्री।

रोहित चीख पड़ा।

“ये सपना है… ये सपना है…”

छोटी लड़की धीरे-धीरे उसके पास आई।

“नहीं… ये आख़िरी सफर है…”

अचानक बस एक झटके से रुकी।

सड़क के बीच एक आदमी खड़ा था।

पूरी तरह घायल।

उसका शरीर खून से भरा हुआ था।

वो बस की तरफ़ हाथ हिला रहा था।

“बचाओ…”

रोहित तुरंत चिल्लाया—

“दरवाज़ा खोलो! उसे मदद चाहिए!”

लेकिन बस में बैठे सभी लोग अचानक हँसने लगे।

धीमी… डरावनी हँसी।

हाहाहा…

ड्राइवर ने धीरे-धीरे अपना सिर रोहित की तरफ़ घुमाया।

“वो… पहले से मर चुका है…”

रोहित की आँखें फटी रह गईं।

तभी सड़क पर खड़ा आदमी अचानक दौड़कर बस की तरफ़ आया।

धड़ाम!

उसने बस की खिड़की पर हाथ मारा।

उसका आधा चेहरा गायब था।

“मुझे अंदर आने दो!!!”

रोहित पीछे हट गया।

लेकिन तभी—

बस अपने आप फिर चल पड़ी।

वो आदमी अंधेरे में गायब हो गया।

रोहित अब पूरी तरह टूट चुका था।

“तुम लोग कौन हो?!”

बूढ़ी औरत की आँखों में आँसू आ गए।

“हम… यात्री हैं…”

“कहाँ के?”

“मौत के…”

बस में अचानक ठंडी हवा भर गई।

तभी कंडक्टर ने टिकट फाड़ते हुए कहा—

“तुम्हारा स्टॉप आने वाला है।”

रोहित काँप गया।

“मुझे कहीं नहीं उतरना!”

छोटी लड़की मुस्कुराई—

“सब यही कहते हैं…”

कुछ देर बाद बस एक पुराने पुल के पास रुकी।

नीचे गहरी नदी बह रही थी।

कंडक्टर ने दरवाज़ा खोला।

“उतर जाओ।”

रोहित ने बाहर देखा—

और उसका खून जम गया।

पुल के नीचे एक टूटी हुई बस पड़ी थी।

पूरी जली हुई।

उस पर नंबर लिखा था—

13

रोहित के दिमाग में जैसे विस्फोट हुआ।

उसे अचानक अखबार की एक खबर याद आई।

पाँच साल पहले बस नंबर 13 नदी में गिर गई थी।

उस हादसे में कोई नहीं बचा था।

उसने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर बस के अंदर देखा।

अब सारे यात्री उसे घूर रहे थे।

उनकी आँखें काली हो चुकी थीं।

छोटी लड़की बोली—

“हम तब से घर नहीं पहुँचे…”

अचानक बस के अंदर से जलने की बदबू आने लगी।

सभी यात्रियों के चेहरे पिघलने लगे।

रोहित चीखने लगा।

“नहीं!!!”

कंडक्टर उसकी तरफ़ बढ़ा।

“अब… तुम भी हमारे साथ चलोगे…”

रोहित पूरी ताकत से बस से कूद गया।

वो पुल से नीचे नदी में गिरा।

कुछ देर बाद…

मछुआरों ने उसे बेहोशी की हालत में बाहर निकाला।

जब उसे होश आया, वो अस्पताल में था।

सबने उसकी कहानी को हादसे का सदमा समझा।

लेकिन रोहित जानता था—

उसने जो देखा वो सच था।

कुछ महीनों बाद…

एक नई रात…

एक नया यात्री बस स्टैंड पर खड़ा था।

तभी धुंध में से एक पुरानी बस धीरे-धीरे बाहर आई।

उस पर लिखा था—

13

और अंदर खिड़की के पास…

रोहित बैठा मुस्कुरा रहा था। 👁️

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