सफेद गुड़िया

 सफेद गुड़िया

छोटे से कस्बे रामपुर में एक पुरानी खिलौनों की दुकान थी। दुकान का नाम था — “नन्ही दुनिया”।

उस दुकान का मालिक था बूढ़ा मोहनलाल।

दुकान बाहर से बहुत साधारण दिखती थी, लेकिन गाँव के बच्चे वहाँ जाने से डरते थे।

क्योंकि वहाँ एक गुड़िया रखी थी…

सफेद कपड़े, नीली आँखें और चेहरे पर अजीब मुस्कान वाली गुड़िया।

लोग उसे “रिया” कहते थे।

कहते थे, रात में उसकी आँखें अपने आप घूमती थीं।

लेकिन नेहा इन बातों पर विश्वास नहीं करती थी।

नेहा 17 साल की थी। उसे पुरानी चीज़ें इकट्ठा करने का शौक था। एक दिन वो अपनी दोस्त पूजा के साथ उस दुकान पर पहुँची।

जैसे ही वो अंदर गई, उसकी नजर सीधे उस सफेद गुड़िया पर पड़ी।

“वाह… कितनी सुंदर है…” नेहा बोली।

मोहनलाल का चेहरा अचानक उतर गया।

“बेटी… वो मत लेना।”

नेहा हँस पड़ी—“क्यों? भूत है क्या उसमें?”

बूढ़ा काँपती आवाज़ में बोला—

“कुछ चीज़ें मज़ाक नहीं होतीं…”

लेकिन नेहा ने उसकी बात नहीं मानी।

उसने गुड़िया खरीद ली।

दुकान से निकलते समय मोहनलाल ने सिर्फ़ एक बात कही—

“रात को… उसकी आँखों में मत देखना…”

उस रात…

नेहा ने गुड़िया अपने कमरे में रख दी।

उसकी माँ ने भी उसे देखकर कहा—

“अजीब गुड़िया है… मुझे पसंद नहीं।”

लेकिन नेहा खुश थी।

रात के करीब 1 बजे…

अचानक उसकी नींद खुल गई।

उसे लगा जैसे कमरे में कोई फुसफुसा रहा हो।

धीमी… बहुत धीमी आवाज़।

“नेहा…”

वो उठकर बैठ गई।

कमरा खाली था।

उसने पानी पिया और वापस लेट गई।

तभी उसकी नजर गुड़िया पर गई।

अब वो पहले वाली जगह पर नहीं थी।

वो कुर्सी से नीचे फर्श पर बैठी थी।

नेहा का दिल तेज़ धड़कने लगा।

“शायद गिर गई होगी…”

वो खुद को समझाने लगी।

उसने गुड़िया वापस कुर्सी पर रख दी।

लेकिन जैसे ही वो बिस्तर पर लेटी—

टक…

टक…

टक…

जैसे कोई लकड़ी पर उँगलियाँ मार रहा हो।

आवाज़ कमरे के कोने से आ रही थी।

नेहा ने डरते हुए वहाँ देखा।

गुड़िया की गर्दन धीरे-धीरे उसकी तरफ घूम रही थी।

नेहा चीख पड़ी।

अचानक लाइट बंद हो गई।

पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।

और फिर…

एक छोटी बच्ची की हँसी गूँजने लगी।

हिहिहि…

हिहिहि…

नेहा रोते हुए कमरे से बाहर भागी।

उसकी माँ जाग गईं।

“क्या हुआ?”

“वो… वो गुड़िया…”

लेकिन जब दोनों कमरे में वापस गईं…

गुड़िया बिल्कुल शांत कुर्सी पर बैठी थी।

अगले दिन किसी ने नेहा की बात पर विश्वास नहीं किया।

यहाँ तक कि पूजा भी हँसने लगी।

“तू हॉरर फिल्में ज़्यादा देखती है।”

लेकिन उसी रात…

सब बदल गया।

रात के 2 बजे पूजा का फोन आया।

वो बहुत डरी हुई लग रही थी।

“नेहा… वो गुड़िया…”

“क्या हुआ?”

“वो मेरे घर के बाहर खड़ी है…”

नेहा का खून जम गया।

“क्या?!”

पूजा रोने लगी—

“उसकी आँखें… वो मुझे देख रही है…”

अचानक फोन पर किसी बच्ची की आवाज़ आई—

“अब तुम्हारी बारी है…”

फिर कॉल कट गई।

नेहा तुरंत पूजा के घर भागी।

लेकिन वहाँ पहुँचते ही उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

घर के बाहर पुलिस खड़ी थी।

पूजा अपने कमरे में बेहोश मिली थी।

दीवार पर खून से लिखा था—

“रिया खेलना चाहती है…”

उस रात नेहा को नींद नहीं आई।

उसने तय किया कि वो गुड़िया को फेंक देगी।

सुबह होते ही वो उसे लेकर नदी के किनारे गई।

उसने पूरी ताकत से गुड़िया को पानी में फेंक दिया।

गुड़िया धीरे-धीरे डूब गई।

नेहा ने राहत की साँस ली।

लेकिन जैसे ही वो मुड़ी—

उसे पीछे से बच्ची की आवाज़ सुनाई दी—

“तुम मुझे छोड़कर जा रही हो…?”

नेहा ने काँपते हुए पीछे देखा।

गुड़िया फिर उसके पीछे खड़ी थी।

सूखी हुई।

जैसे कभी पानी में गई ही नहीं।

उसकी आँखें अब लाल थीं।

नेहा डरकर भागी।

घर पहुँचते ही उसने कमरे का दरवाज़ा बंद कर लिया।

लेकिन तभी…

अलमारी के अंदर से आवाज़ आई—

टक…

टक…

टक…

नेहा धीरे-धीरे अलमारी के पास गई।

आवाज़ बंद हो गई।

उसने डरते हुए दरवाज़ा खोला—

अंदर वही गुड़िया बैठी थी।

और उसके हाथ में एक पुरानी फोटो थी।

फोटो में एक छोटी लड़की थी…

जिसका चेहरा बिल्कुल गुड़िया जैसा था।

पीछे लिखा था—

“रिया, उम्र 8 साल”

तभी नेहा की माँ कमरे में आईं।

फोटो देखते ही उनका चेहरा सफेद पड़ गया।

“ये… ये असंभव है…”

“क्या हुआ माँ?”

उनकी आँखों में आँसू आ गए।

“रिया… मेरी छोटी बहन थी…”

नेहा चौंक गई।

“क्या?!”

“वो बचपन में गायब हो गई थी… और कभी नहीं मिली…”

अचानक कमरे का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

कमरे में ठंडी हवा भर गई।

और फिर…

एक छोटी बच्ची की आवाज़ आई—

“मुझे सब भूल गए थे…”

गुड़िया धीरे-धीरे हिलने लगी।

उसकी आँखों से काला पानी बह रहा था।

“अब… कोई मुझे छोड़कर नहीं जाएगा…”

अचानक लाइट्स जलने-बुझने लगीं।

नेहा और उसकी माँ चीखते हुए दरवाज़ा खोलने लगे।

लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला।

तभी—

गुड़िया की मुस्कान और बड़ी हो गई।

और उसकी आवाज़ पूरे कमरे में गूँजी—

“अब हम हमेशा साथ रहेंगे…” 👁️

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