लालटेन वाला आदमी
बरसात की काली रात थी। आसमान में बिजली लगातार चमक रही थी। सड़क सुनसान थी। दूर-दूर तक सिर्फ़ जंगल और अंधेरा।
विवेक अपनी बाइक से शहर लौट रहा था। उसे देर हो चुकी थी। फोन की बैटरी खत्म हो चुकी थी और बारिश इतनी तेज़ थी कि रास्ता भी साफ़ नहीं दिख रहा था।
तभी उसकी बाइक अचानक बंद हो गई।
“ओह नहीं… अभी नहीं…” उसने परेशान होकर कहा।
उसने कई बार स्टार्ट करने की कोशिश की, लेकिन बाइक चालू नहीं हुई।
तभी बिजली चमकी…
और उसे सड़क के किनारे एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया।
उसके हाथ में पुरानी लालटेन थी।
सफेद कपड़े… झुका हुआ शरीर… और चेहरे पर अजीब मुस्कान।
विवेक थोड़ा डर गया, लेकिन मदद के लिए उसके पास गया।
“बाबा, यहाँ आसपास कोई मैकेनिक मिलेगा?”
बूढ़ा आदमी धीरे से बोला—
“इस वक्त… नहीं।”
उसकी आवाज़ बहुत भारी थी।
“तो मैं क्या करूँ?”
बूढ़े ने जंगल की तरफ़ इशारा किया।
“आगे एक हवेली है… रात गुजार लो… सुबह चले जाना।”
विवेक ने उधर देखा।
जंगल के बीच सचमुच एक पुरानी हवेली दिखाई दे रही थी।
उसने बूढ़े से पूछा—“आप वहाँ रहते हो?”
बूढ़ा मुस्कुराया।
“नहीं… मैं सिर्फ़ रास्ता दिखाता हूँ…”
ये सुनकर विवेक को अजीब लगा।
लेकिन उसके पास और कोई रास्ता नहीं था।
वो बाइक वहीं छोड़कर हवेली की तरफ़ चल पड़ा।
बारिश और तेज़ हो गई।
हवेली के पास पहुँचते ही उसे एहसास हुआ कि ये जगह बहुत पुरानी है।
दीवारों पर काई जमी थी। खिड़कियाँ टूटी हुई थीं।
लेकिन सबसे अजीब बात—
अंदर रोशनी जल रही थी।
विवेक ने दरवाज़ा खटखटाया।
धीरे-धीरे दरवाज़ा खुला।
एक औरत सामने खड़ी थी।
करीब 50 साल की… चेहरे पर अजीब शांति।
“आओ बेटा,” उसने मुस्कुराकर कहा, “तुम्हारा ही इंतज़ार था।”
विवेक चौंका।
“आपको कैसे पता मैं आने वाला हूँ?”
औरत कुछ सेकंड चुप रही।
फिर बोली—
“यहाँ आने वाले सब आते हैं…”
विवेक को उसका जवाब समझ नहीं आया।
लेकिन वो अंदर चला गया।
हवेली अंदर से बाहर से भी ज्यादा डरावनी थी।
पुरानी तस्वीरें… टूटे फर्नीचर… और हर जगह धूल।
लेकिन एक चीज़ अजीब थी—
दीवार पर लगी घड़ी बंद थी… और उसमें हमेशा 2:17 बज रहे थे।
“ये घड़ी बंद है?” विवेक ने पूछा।
औरत अचानक गंभीर हो गई।
“इस घर में समय… 2:17 के बाद नहीं चलता।”
विवेक हँस पड़ा—“अजीब मज़ाक है।”
औरत ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसने विवेक को ऊपर वाले कमरे में ठहरने के लिए कहा।
कमरा पुराना था लेकिन साफ़।
थकान की वजह से विवेक जल्दी सो गया।
रात के करीब 2 बजे…
उसे किसी के चलने की आवाज़ सुनाई दी।
ठक… ठक… ठक…
जैसे कोई लकड़ी की छड़ी लेकर चल रहा हो।
विवेक की आँख खुल गई।
आवाज़ कमरे के बाहर से आ रही थी।
उसने दरवाज़ा खोला।
गलियारा खाली था।
लेकिन फर्श पर पानी फैला हुआ था… जैसे कोई भीगता हुआ आदमी अभी-अभी वहाँ से गुज़रा हो।
ठक… ठक…
आवाज़ फिर आई।
इस बार नीचे से।
विवेक धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरने लगा।
नीचे हॉल में अंधेरा था।
सिर्फ़ एक लालटेन जल रही थी।
वही लालटेन… जो उस बूढ़े आदमी के हाथ में थी।
विवेक का दिल तेज़ धड़कने लगा।
“कौन है?” उसने पूछा।
तभी उसे पीछे से आवाज़ आई—
“तुम्हें ऊपर रहना चाहिए था…”
वो पलटा।
वही औरत खड़ी थी।
लेकिन अब उसका चेहरा बदला हुआ था।
आँखें लाल… और चेहरा गुस्से से भरा।
“क्या हुआ आपको?” विवेक डरते हुए बोला।
औरत धीरे-धीरे उसके करीब आई।
“2:17 के बाद… वो जाग जाता है…”
अचानक पूरी हवेली में तेज़ हवा चलने लगी।
सारी खिड़कियाँ अपने आप खुल गईं।
और तभी—
ठक… ठक… ठक…
सीढ़ियों से कोई नीचे उतर रहा था।
विवेक ने डरते हुए ऊपर देखा।
एक लंबा आदमी…
सफेद कपड़े…
हाथ में लालटेन…
लेकिन उसका चेहरा नहीं था।
सिर्फ़ काला अंधेरा।
विवेक के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
“ये… ये कौन है?”
औरत काँपते हुए बोली—
“मौत…”
वो आदमी धीरे-धीरे नीचे उतर रहा था।
जहाँ-जहाँ उसके कदम पड़ते… वहाँ पानी और मिट्टी के निशान बन जाते।
विवेक पीछे हटने लगा।
“मुझे यहाँ से जाना है!”
औरत चिल्लाई—
“भागो!!!”
विवेक दरवाज़े की तरफ़ दौड़ा।
लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला।
उसने पूरी ताकत लगाई—
फिर भी नहीं खुला।
ठक… ठक…
आवाज़ अब बिल्कुल पीछे थी।
विवेक ने मुड़कर देखा।
वो बिना चेहरे वाला आदमी उसके सामने खड़ा था।
उसकी लालटेन की रोशनी सीधे विवेक के चेहरे पर पड़ी।
और तभी—
विवेक को अजीब-अजीब दृश्य दिखने लगे।
लोग चीख रहे थे…
कोई आग में जल रहा था…
कोई मदद माँग रहा था…
और उन सबके बीच वही आदमी खड़ा था।
विवेक ज़ोर से चीखा।
“ये क्या है???”
औरत रोने लगी—
“ये हवेली शापित है… जो यहाँ आता है… वो कभी वापस नहीं जाता…”
“लेकिन क्यों?”
औरत की आँखों से आँसू बहने लगे।
“20 साल पहले… यहाँ एक आदमी रहता था। वो लोगों को रात में रास्ता दिखाकर यहाँ लाता था…”
“फिर?”
“वो उनकी हत्या कर देता था…”
विवेक को अचानक वो बूढ़ा आदमी याद आया।
“लालटेन वाला…?”
औरत ने सिर हिलाया।
“एक रात गाँव वालों ने उसे मार डाला… लेकिन मरने से पहले उसने कहा था—”
अचानक हवा में भारी आवाज़ गूँजी—
“मैं वापस आऊँगा…”
विवेक का दिल बैठ गया।
वो बिना चेहरे वाला आदमी अब उसके बिल्कुल सामने था।
अचानक उसकी लालटेन बुझ गई।
पूरा हॉल अंधेरे में डूब गया।
और फिर…
किसी ने विवेक के कान में फुसफुसाया—
“अब… तुम्हारी बारी है…”
विवेक चीखते हुए भागा।
उसे ऊपर एक खिड़की खुली दिखाई दी।
वो पूरी ताकत से वहाँ दौड़ा।
पीछे से ठक… ठक… ठक… की आवाज़ तेज़ होती जा रही थी।
वो खिड़की तक पहुँचा… और बिना सोचे नीचे कूद गया।
धड़ाम!
वो नीचे कीचड़ में गिरा।
उसके पैर में चोट लगी, लेकिन वो रुका नहीं।
वो जंगल की तरफ़ भागता रहा।
पीछे से लालटेन की रोशनी उसका पीछा कर रही थी।
ठक… ठक… ठक…
आवाज़ पास आती जा रही थी।
अचानक उसे सड़क दिखाई दी।
और उसी समय एक ट्रक वहाँ से गुज़रा।
ड्राइवर ने उसे देखकर ब्रेक लगाया।
“क्या हुआ भाई?!”
विवेक हाँफते हुए बोला—“मुझे यहाँ से ले चलो!”
ट्रक वाला उसे लेकर शहर आ गया।
अगले दिन…
विवेक पुलिस के साथ वापस उस जगह पहुँचा।
लेकिन वहाँ कुछ नहीं था।
न हवेली…
न जंगल…
बस खाली मैदान।
पुलिस वाले हँसने लगे—“शायद तुम्हें भ्रम हुआ होगा।”
लेकिन विवेक जानता था… उसने जो देखा वो सच था।
उस रात…
वो अपने कमरे में अकेला बैठा था।
तभी बिजली चली गई।
पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।
और फिर…
ठक… ठक… ठक…
उसे वही आवाज़ सुनाई दी।
उसका दिल रुकने लगा।
धीरे-धीरे कमरे के बाहर लाल रोशनी दिखाई दी।
जैसे कोई लालटेन लेकर खड़ा हो।
फिर…
दरवाज़े के नीचे से मिट्टी और पानी अंदर आने लगा।
और एक भारी आवाज़ गूँजी—
“तुम बचकर नहीं जा सकते…”
अगली सुबह…
पड़ोसियों ने विवेक का कमरा खुला देखा।
अंदर कोई नहीं था।
बस फर्श पर गीले पैरों के निशान थे…
जो दरवाज़े से शुरू होकर दीवार के अंदर जाकर खत्म हो रहे थे।
और कमरे के कोने में…
एक पुरानी लालटेन जल रही थी। 👁️
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