सम्राट का खोया हुआ राज़
साल 1542।
राजस्थान के रेगिस्तान के बीचों-बीच एक छोटा-सा राज्य था—सूर्यगढ़। चारों तरफ ऊँचे किले, विशाल दरवाज़े और तलवारों की खनक उस राज्य की पहचान थी। लोग कहते थे कि सूर्यगढ़ के नीचे ऐसा खजाना छिपा है, जिसे पाने वाला पूरे भारत का सबसे शक्तिशाली राजा बन सकता है।
लेकिन उस खजाने तक पहुँचने का रास्ता सिर्फ एक इंसान जानता था—राजा विक्रमदेव।
राजा विक्रमदेव न्यायप्रिय था। उसकी प्रजा उससे बहुत प्यार करती थी। लेकिन उसके अपने ही दरबार में एक ऐसा व्यक्ति था, जिसकी नज़र सिंहासन और खजाने दोनों पर थी—मंत्री भैरवसिंह।
भैरवसिंह बाहर से वफादार दिखता था, पर अंदर से बेहद लालची था। कई वर्षों से वह खजाने का रहस्य जानने की कोशिश कर रहा था। मगर राजा ने कभी किसी को उसके बारे में नहीं बताया।
एक रात महल के गुप्त कक्ष में राजा विक्रमदेव अपने सबसे भरोसेमंद सैनिक अर्जुन को बुलाता है।
“अर्जुन,” राजा धीमी आवाज़ में बोला, “अगर मेरे साथ कुछ भी हो जाए, तो इस नक्शे को सुरक्षित रखना।”
राजा ने एक पुराना कपड़े का नक्शा अर्जुन को दिया। उस नक्शे पर अजीब चिन्ह बने हुए थे।
अर्जुन हैरान था।
“महाराज, इसमें ऐसा क्या है?”
राजा कुछ बोलता, उससे पहले महल के बाहर शोर मचने लगा। सैनिक भागते हुए अंदर आए।
“महाराज! दुश्मन सेना ने हमला कर दिया!”
राजा तुरंत तलवार उठाकर बाहर चला गया।
उस रात सूर्यगढ़ का आसमान आग और धुएँ से भर गया। तलवारों की आवाज़, घोड़ों की दौड़ और सैनिकों की चीखें हर तरफ गूँज रही थीं।
अर्जुन ने देखा कि हमला करने वाली सेना का नेतृत्व कोई और नहीं बल्कि मंत्री भैरवसिंह कर रहा था।
“धोखेबाज़!” अर्जुन चिल्लाया।
भैरवसिंह हँसा।
“राजा बूढ़ा हो चुका है। अब सूर्यगढ़ पर मेरा राज होगा।”
युद्ध पूरी रात चला। अंत में राजा विक्रमदेव घायल हो गया। मरने से पहले उसने अर्जुन का हाथ पकड़ा।
“खजाना गलत हाथों में नहीं जाना चाहिए…”
इतना कहकर राजा ने आखिरी साँस ली।
अर्जुन की आँखों में आँसू आ गए। उसने नक्शा अपने कपड़ों में छिपाया और महल से भाग निकला।
उस दिन के बाद सूर्यगढ़ पर भैरवसिंह का कब्ज़ा हो गया।
लेकिन वह खजाना नहीं ढूँढ पाया।
क्योंकि नक्शा अर्जुन के पास था।
अर्जुन कई दिनों तक जंगलों और गाँवों में छिपता रहा। भैरवसिंह ने उसकी तलाश में सैनिक भेज दिए थे।
एक रात अर्जुन एक पुराने मंदिर में पहुँचा। मंदिर वीरान था। दीवारों पर प्राचीन चित्र बने हुए थे।
वहाँ उसे एक बूढ़ा साधु मिला।
साधु ने अर्जुन को देखते ही कहा,
“तुम सूर्यगढ़ से आए हो।”
अर्जुन चौंक गया।
“आपको कैसे पता?”
साधु मुस्कुराया।
“तुम्हारी तलवार पर सूर्यगढ़ का चिन्ह बना है।”
अर्जुन ने साधु को सब कुछ बता दिया।
साधु कुछ देर चुप रहा, फिर बोला—
“जिस खजाने को तुम ढूँढ रहे हो, वह सिर्फ सोना-चाँदी नहीं है। उसमें एक ऐसी शक्ति छिपी है, जो पूरे इतिहास को बदल सकती है।”
अर्जुन हैरान था।
“कैसी शक्ति?”
साधु उसे मंदिर के पीछे ले गया। वहाँ एक पत्थर की दीवार पर संस्कृत में कुछ लिखा था।
साधु बोला—
“सदियों पहले सूर्यगढ़ के राजाओं ने एक दिव्य तलवार छिपाई थी। कहते हैं कि वह तलवार जिस राजा के हाथ में हो, उसे युद्ध में कोई हरा नहीं सकता।”
अर्जुन समझ गया कि भैरवसिंह उसी तलवार के पीछे है।
“लेकिन खजाना कहाँ है?” अर्जुन ने पूछा।
साधु ने नक्शे को ध्यान से देखा।
“यह नक्शा अधूरा है। इसका दूसरा हिस्सा चंद्रगढ़ किले में छिपा है।”
चंद्रगढ़…
वह जगह भूतिया मानी जाती थी। लोग कहते थे कि वहाँ जाने वाला कभी वापस नहीं आता।
लेकिन अर्जुन के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था।
अगली सुबह वह चंद्रगढ़ के लिए निकल पड़ा।
तीन दिन बाद अर्जुन चंद्रगढ़ पहुँचा।
किला पहाड़ों के बीच बना था। टूटी हुई दीवारें और अंधेरे गलियारे उसे और डरावना बना रहे थे।
जैसे ही अर्जुन अंदर गया, उसे लगा कोई उसका पीछा कर रहा है।
अचानक पीछे से आवाज़ आई—
“रुक जाओ!”
अर्जुन ने तलवार निकाल ली।
उसके सामने एक लड़की खड़ी थी। हाथ में धनुष और आँखों में गुस्सा।
“तुम कौन हो?” अर्जुन ने पूछा।
“मेरा नाम मीरा है। और यह किला मेरा घर है।”
मीरा एक योद्धा थी। उसके पिता कभी सूर्यगढ़ की सेना में थे, लेकिन भैरवसिंह ने उन्हें मरवा दिया था।
जब अर्जुन ने उसे सच्चाई बताई, तो मीरा उसकी मदद करने को तैयार हो गई।
दोनों किले के अंदर गुप्त रास्तों में आगे बढ़ने लगे।
कई घंटों बाद उन्हें एक विशाल दरवाज़ा मिला।
उस दरवाज़े पर लिखा था—
“सिर्फ सच्चा रक्षक ही आगे बढ़ सकता है।”
दरवाज़ा बंद था। उसके बीच में तीन गोल निशान बने थे।
अर्जुन ने नक्शे को ध्यान से देखा। उसमें वही निशान बने थे।
उसने दीवार पर बने पत्थरों को दबाया।
अचानक पूरी ज़मीन हिलने लगी।
दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।
अंदर एक बड़ा कक्ष था, जिसमें सोने के बर्तन, हीरे-जवाहरात और पुरानी मूर्तियाँ रखी थीं।
लेकिन अर्जुन की नज़र सीधे बीच में रखी एक चमकती तलवार पर गई।
वही दिव्य तलवार।
जैसे ही अर्जुन तलवार के पास पहुँचा, पीछे से ताली बजने की आवाज़ आई।
“बहुत अच्छा अर्जुन।”
भैरवसिंह!
वह अपने सैनिकों के साथ वहाँ खड़ा था।
“तुमने मेरा काम आसान कर दिया,” भैरवसिंह हँसते हुए बोला।
अर्जुन गुस्से से भर गया।
“तूने अपने राजा को धोखा दिया!”
भैरवसिंह चिल्लाया—
“राजा कमजोर था! सूर्यगढ़ को ताकत चाहिए थी!”
उसने तलवार उठाने की कोशिश की।
लेकिन जैसे ही उसने तलवार को छुआ, अचानक तेज़ रोशनी फैल गई।
भैरवसिंह दर्द से चीखने लगा।
तलवार उसके हाथों को जला रही थी।
साधु की बात सच थी।
तलवार सिर्फ सच्चे रक्षक को स्वीकार करती थी।
भैरवसिंह पीछे गिर पड़ा।
अर्जुन आगे बढ़ा और तलवार को हाथ में उठाया।
तुरंत पूरा कक्ष रोशनी से भर गया।
दीवारों पर बने चिन्ह चमकने लगे।
भैरवसिंह डर गया।
“नहीं… ये नहीं हो सकता…”
लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।
भैरवसिंह ने गुस्से में हमला कर दिया।
अर्जुन और भैरवसिंह के बीच भयंकर युद्ध शुरू हुआ।
तलवारें टकराने लगीं। चिंगारियाँ उड़ने लगीं।
भैरवसिंह ताकतवर था, लेकिन लालच ने उसे अंधा बना दिया था।
अंत में अर्जुन ने एक जोरदार वार किया।
भैरवसिंह की तलवार टूट गई।
वह घुटनों पर गिर पड़ा।
“मुझे माफ कर दो…” उसने काँपती आवाज़ में कहा।
अर्जुन ने शांत होकर जवाब दिया—
“जिस इंसान ने अपने राजा और राज्य से विश्वासघात किया हो, उसे इतिहास कभी माफ नहीं करता।”
उसी समय कक्ष की छत टूटने लगी।
मीरा चिल्लाई—
“हमें यहाँ से निकलना होगा!”
अर्जुन और मीरा तेजी से बाहर भागे।
कुछ ही पलों बाद पूरा गुप्त कक्ष पत्थरों के नीचे दब गया।
दिव्य खजाना हमेशा के लिए धरती में समा गया।
कुछ महीनों बाद…
सूर्यगढ़ फिर से आज़ाद हो चुका था।
प्रजा ने अर्जुन को नया रक्षक घोषित किया।
लेकिन अर्जुन ने सिंहासन लेने से मना कर दिया।
उसने कहा—
“राज्य किसी एक इंसान का नहीं होता। उसका असली मालिक उसकी प्रजा होती है।”
मीरा मुस्कुराई।
सूर्यगढ़ में फिर से खुशहाली लौट आई।
लोग आज भी कहते हैं कि रेगिस्तान के नीचे कहीं वह दिव्य तलवार अब भी छिपी हुई है।
और जब भी सूर्यगढ़ पर कोई बड़ा संकट आएगा, इतिहास फिर किसी अर्जुन को जन्म देगा।
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